Sunday, January 15, 2017

भूल बैठे हैं।

एक उनकी ख्वाहिशों में हम जमाना भूल बैठे हैं
मोहब्बत के सफर में हम ठिकाना भूल बैठे हैं।।

जो उनके साथ बीते हैं वो लम्हे याद हैं अब भी
बिना उनके गुजारा वक्त सारा भूल बैठे हैं।।

वो आँखें थी किसी दरिया में बनते से भँवर जैसी
कि जिनमें डूब कर अपना किनारा भूल बैठे हैं।।

ना जाने कैसी थी जादूगरी पुरनूर चेहरे की
कि उनकी याद है सूरत खुदा की भूल बैठे हैं।।

मैं लिखता था बहुत कुछ और कई अंदाज थे मेरे
महज़ गजलों में सिमटे हैं कि लिखना भूल बैठे हैं ।।

क्या कम थीं आँखें और काया कि अब रूखसार का ये तिल
क्या लिखें शान में उनकी कि स्वर हम भूल बैठे हैं।।

मुकम्मल होना है एक दिन मेरा भी इश्क तो 'आखिर'
मेरे हर अक्स में वो हैं कि खुद को भूल बैठे हैं।।

।।आखिर।।

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