Monday, November 14, 2016

खुद को खोज रहा हूँ कब से महफिल में वीराने में

खुद को खोज रहा हूँ कब से महफिल में वीराने में
मिला नहीं मैं मंदिर मस्जिद गुरुद्वारा मैखाने में।।

मैं था नदियों सा चंचल मैं झरनों की झर्राहट था
मुझको बांध दिया झीलों सा जीवन की कड़वाहट ने।।

प्यार लुटाता था सब पर बस प्यार की बातें करता था
द्वेष द्वंद और घृणा समा दी इस दिल में घबराहट ने।।

इंसान था मैं शायद पहले सबकी बातें करता था
बाँट लिया है मैंने खुद को मंदिर और मजा़रों में।।

काट रहे हम एक दूजे को बस मजहब के नामों में
बहते देखीं खून की नदियाँ झूठी शान बचाने में।।

ईमान ही मेरा मजहब था रिश्तों-नातों के साए में
छूट गए हैं सब पीछे शोहरत की अंधी चाहत में।।

प्यार मैं करता था खुद से खुद को आगे मैं रखता था
भूल गया हूँ मैं खुद को इक उस चेहरे की चाहत में।।

।।आखिर।।

No comments:

Post a Comment