Monday, October 17, 2016

कुछ बातें

आईए जिंदगी से कुछ बातें करते हैं
औरों से ना सही खुद से ही मुलाकातें करते हैं।

जो कट रही है भाग-दौड़ में वो ज़िंदगी कहाँ
जरा खुद से मिलकर अब जीने की साजिश करते हैं।

वो जिन्होंने हमें चलना सिखाया था अब थक गए हैं
वक्त रहते उन कदमों की मालिश करते हैं।

रिश्ते, नाते, वफा, मोहब्बत खो गए हैं कहीं
खुद को भूल कर इन्हें पाने की ख्वाहिश करते हैं।

वो जो चलते-चलते गिर जाता है रास्तों पर भूखा है
उन्हें कुछ खिलाकर अपना जीना सार्थक करते हैं।

वो जो राह चलते भीख मांगते हैं निरीह से बच्चे हैं
अब उनका कल संवारने की कोशिश करते हैं।

हम मोहब्बत करते हैं जिनसे वो ही हमसे रूठे बैठे हैं
आईए उन्हें मनाने की सिफारिश करते हैं।

ना एेसी हरकतें की तो भी एक दिन मरना है 'आखिर'
चलो आओ कुछ अच्छा कर कफन की ओर चलते हैं।
आइए जिन्दगी से कुछ बातें करते हैं।।

।।आखिर।।

Monday, October 3, 2016

बेबसी

बस कर ऐ जिन्दगी और कितने इम्तिहान लेगी मेरा
थक गया हूँ मैं इस शगुफ्ता मुखौटे को ओढ़ कर।

ना जाने कब जा कर पूरी होंगी हसरतें हमारी
हो गया हूँ चूर तेरे रास्तों पर दौड़-दौड़ कर।

मैं जब भी मुस्कुराता हूँ किसी भी मोड़ पर आकर
तू मिलती है मुझे अगले कदम गमों को ओढ़ कर।

मोहब्बत करते हैं जिनसे तू उनसे दूर करती है
कि पथरा जातीं हैं आँखें इक उनका रस्ता देख कर।

अभी जिन्दा हूँ मैं तो तू मुझे हँसने तो दे आखिर
कि कल सो जाउंगा दो गज़ कफन को अपने ओढ़ कर।

ना मिलना होगा फिर और फिर ना उनसे बातें ही होंगी
अभी सो जाने दे संग उनकी बाँहों को ही ओढ़ कर।

।।आखिर।।