Saturday, March 26, 2016

विडंबना

ना मंदिर में वो मूरत है ना अब ऐसी विचारें हैं
सिखाये प्यार इंसान को कहां ऐसी मजा़रें हैं।।

खुले मंदिर खुले मस्जिद भला दिखते कहा हैं अब
बताओ वो कहाँ जाएंगें जो बेघर बेचारे हैं।।

खुराफाती हुए हैं लोग इस तरह कि क्या बोलूँ
कि बकरे हो गए मुस्लिम फकत हिंदू की गाएं हैं।।

फक्र था हमको तब जिस एकता का हिंद की अपनी
उसी में खुद लगाने सेंध हम सज-धज के आए हैं।।

बिगड़ेगा हमारा क्या बुरा कोई बाहरी दुश्मन
हम आपस में ही लड़कर अपना ही घर फूंक आए हैं।।

बना रखा है कैसा हमने मिलकर देश का आलम
कि आँखों से छलकता खौफ है सहमे से साए हैं।।

यूँ ही चलता रहा तो कैसे हम जी पाएंगे 'आखिर'
बड़ी उम्मीद लेकर हम भी तो दुनिया में आए हैं।।

।।आखिर।।

No comments:

Post a Comment