Saturday, March 26, 2016

विडंबना

ना मंदिर में वो मूरत है ना अब ऐसी विचारें हैं
सिखाये प्यार इंसान को कहां ऐसी मजा़रें हैं।।

खुले मंदिर खुले मस्जिद भला दिखते कहा हैं अब
बताओ वो कहाँ जाएंगें जो बेघर बेचारे हैं।।

खुराफाती हुए हैं लोग इस तरह कि क्या बोलूँ
कि बकरे हो गए मुस्लिम फकत हिंदू की गाएं हैं।।

फक्र था हमको तब जिस एकता का हिंद की अपनी
उसी में खुद लगाने सेंध हम सज-धज के आए हैं।।

बिगड़ेगा हमारा क्या बुरा कोई बाहरी दुश्मन
हम आपस में ही लड़कर अपना ही घर फूंक आए हैं।।

बना रखा है कैसा हमने मिलकर देश का आलम
कि आँखों से छलकता खौफ है सहमे से साए हैं।।

यूँ ही चलता रहा तो कैसे हम जी पाएंगे 'आखिर'
बड़ी उम्मीद लेकर हम भी तो दुनिया में आए हैं।।

।।आखिर।।

Monday, March 21, 2016

जरा सा प्यार करना है

जरा सा प्यार करना है जरा सा चाहना उसको
खुदा कुछ ऐसा कर कि मुझसे आकर के वो मिल जाए।

जो बरसों से थी मुरझाई हुई ये प्यार की बगिया
मोहब्बत के गुलाबों का इतर वो इसमें भर जाए।।

मैं बंजारा सा हूँ आवारगी फितरत मेरी लेकिन
खुदा कुछ ऐसा हो मैं सादगी से उसके बंध जाऊँ।।

जो फिरता रहता था मैं प्यार की ख्वाहिश लिए दर-दर
फंसा मझधार में था मैं किनारा मुझसे मिल जाए।।

कि उसकी आँखें उसके बाल सुर्ख होठों की लाली
कोई कैसे बचे आखिर दिवाना सबको कर जाए।।

वो यूँ आए मेरे जीवन में जैसे चाँद तारों में
कि उसकी चाँदनी में मैं ज़रा फीका सा पड़ जाऊँ।।

मैं उसको बैठ कर देखूँ मैं उसको हर पहर सोचूँ
मैं उसको इस कदर चाहूँ कि मैं अफसाना बन जाऊँ।।

मेरा ये प्यार उसका है मैं बस उसके लिए 'आखिर'
मुकम्मल ऐसे हो कि ये मेरी पहचान बन जाए।।

मेरा ये नाम छोटा है मगर हसरत बड़ी ये कि
मेरे नाम की मेंहदी बस उसके हाथ जच जाए।।

।।आखिर।।

Sunday, March 20, 2016

हिंदुस्तान-एक परिचय

इन्सान है जिंदा जहाँ ईमान रहता है
हिन्दू वहाँ रहता है मुसलमान रहता है।।

बनते जहाँ यमुना के तीरे ताज-ए-मोहब्बत
वहाँ सिर्फ भाईचारे का पैगाम रहता है।।

खुशियाँ क्यों ना छलकें यहाँ शाम और सहल
मनती दिवाली है कभी रमज़ान रहता है।।

तुम कहते हो हम हैं जुदा एक-दूसरे से फिर
करवा में क्यों और ईद में क्यों चाँद रहता है।।

चाहे दिलों में ख्वाजा जी हों या हो राम जी
पर खून अपना ये वतन के नाम रहता है।।

॥आखिर॥