Sunday, November 15, 2015

आए थे इंसान बनने!

आए थे इंसान बनने
दुनिया ने बाँट दिया
कुछ पूरब गये कुछ पश्चिम
जो बचे उन्हें मजहब ने बाँट दिया।।

अब आए दिन लड़ते हैं एक दूजे से
कभी मकान के नाम पर कभी दुकान के नाम पर
कभी ईश्वर के नाम पर कभी अल्लाह के नाम पर
पर लड़ते नहीं देखा कभी इंसान को इंसान के नाम पर।।

अब बिकती है नफरत सरे आम खुले बाजार में
मोहब्बत हो गई है कैद ना जाने किस दुकान में
कि हर तरफ सुनाई पड़ता है चीखों-चिल्लाहटों का शोर
यूँ लगता है जिंदगी महफूज है तो सिर्फ श्मशान में।।

जिस ओर जाओ बस मार-काट मचा रखा है
हर शहर को कंकालों से सजा रखा है
कि अब रोती है जिंदगी हर शाम हर सुबह
लोगों ने ये कैसा माहौल बना रखा है।।

ना जाने कैसी हैवानियत लोगों पर छाई है
क्यों हर चौराहे पर मौत का व्यापार लगा रखा है?
जहां बिकती हैं जिंदगियाँ कौड़ियों के दाम पर
इस अनमोल सी चीज का क्या हाल बना रखा है।।

हर रोज जलती हैं जिंदगियाँ इस नफरत की आग में
कि हर तरफ हमने कत्ल-ए-आम मचा रखा है
और कैसे ना हो दूषित, "गंगा" हर देश की
हमने स्वार्थ की खातिर इंसानियत का खून बहा रखा है।।

बड़ी असमंजस में हुँ जियूं कि ना जियूं
कि आँखों में कई अरमान सजा रखा है
पर ना जाने कब आलिंगन कर ले मौत मेरा "आखिर"
लोगों ने हर कदम पर बारूद बिछा रखा है।।

।।आखिर।।

Monday, November 9, 2015

मनाना चाहता हूँ हर एक त्योहार मैं घर में
रहना चाहता हूँ हर खुशी में घर के आँगन में
मगर ना जाने कैसी जिंदगी ये हो गयी "आखिर"
कि घर से दूर हूँ मैं साथ ना परिवार मेरा है
मना मैं भी रहा हूँ आज का त्योहार सबके संग
मगर दिल कह रहा है आज ना त्योहार मेरा है।।

।।आखिर।।

Thursday, November 5, 2015

लोकतंत्र ही आफत है।।

कितना अच्छा देश है मेरा, उफ़ कैसी ये सियासत है
यूँ लगता है लोकतंत्र में लोकतंत्र ही आफत है।।

हम जीते स्वछंद पवन में एक दूजे का साथ लिए
हम जीते अपनी मर्जी से जीने का अधिकार लिए
वो अधिकार जिसे हम सब में संविधान ने बाँटा है
वो अधिकार कि जिनके कारण भारत भाग्य विधाता है
पर ना जाने क्यों आपस में हम टकराये रहते हैं
हर लम्हा हम क्यों एक दूजे पर गुर्राये रहते हैं
लगता है हमको बहका के करता कोई सियासत है
यूँ लगता है लोकतंत्र में लोकतंत्र ही आफत है।।

कहने को आजाद हैं हम जाने कैसी आजादी है
हर चौराहे हर नुक्कड़ पर जीवन की बर्बादी है
तीखी धूप भले हो कितनी या कितनी ही ठंड पड़े
जलते बुझते से इंसान दिख जाते हैं सड़कों पर पड़े
जिनकी हालत से अच्छी सड़कों की हालत लगती है
जिनमें कोई छेद हुआ तो सरकार मरम्मत करती है
इंसानों का मोल गिराती सरकारें या सियासत है ?
यूँ लगता है लोकतंत्र में लोकतंत्र ही आफत है।।

यूँ तो भारत में रहने वाले सब एक समान हैं
कोई छोटा है ना बड़ा जब तक ये हिंदुस्तान है
पर ये सब कहने की बातें असल अलग कुछ होता है
भारत में तो सबसे उपर केवल नेता होता है
जिनको चुन कर के संसद में हमने भेजा होता है
और जब उनकी पड़े जरूरत तभी नदारद होता है
पाँच साल तक भारत पर वो करता यूँ मनमानी है
भारत उसके पुरखों की जागीर दिखाई देता है
संसद में भेजे सेवक को राजा करती सियासत है
यूँ लगता है लोकतंत्र में लोकतंत्र ही आफत है।।

।।आखिर।।