Friday, June 19, 2015

ज़िन्दगी जीना चाहता हूँ

था अभी तक मैं डरा सा और सहमा सा ज़रा
था अभी तक व्यर्थ की चिंता में मैं डूबा रहा
थी अभी तक मेरे हंसने-रोने पर पाबंदियां
थे मेरे भी पर मगर चलता थे ले पगडंडियां
मुश्किलों को ताख पर रख खुल के उड़ना चाहता हूँ
आज फिर से ज़िन्दगी मैं तुझको जीना चाहता हूँ ॥

चाहता हूँ हंसना थोड़ा और रोना भी ज़रा
चाहता हूँ उड़ना थोड़ा और गिरना भी ज़रा
चाहता हूँ मैं समय सा ही सदा चलता ही जाऊं
चाहता हूँ मैं ना रुकना और सुस्ताना ज़रा
इस तरह मैं बिन रुके ,जीवन पे चलना चाहता हूँ
आज फिर से ज़िन्दगी मैं तुझको जीना चाहता हूँ ॥

चाहता हूँ तारा बनना फिर किसी की आँख का
चाहता हूँ प्यार पाना मैं हर एक हालात का
चाहता हूँ फिर से मेरे सर पे कोई हाथ फेरे
चाहता हूँ कोई दे आशीष मुझको हर दफा
फिर मैं माँ की गोंद में सर रखकर सोना चाहता हूँ
आज फिर से ज़िन्दगी मैं तुझको जीना चाहता हूँ ॥

चाहता हूँ मैं किसी आँखों से आँखें चार करना
चाहता हूँ मैं उन्ही में डूबना और फिर उतरना
चाहता हूँ कोई मेरे साथ जीवनभर चले
चाहता हूँ मैं ज़माने में किसी से प्यार करना
आज खुद को प्यार का मैं तोहफा देना चाहता हूँ
आज फिर से ज़िन्दगी मैं तुझको जीना चाहता हूँ ॥

इस ज़रा सी ज़िन्दगी के कुछ अलग हालात हैं
व्यस्त है हर एक व्यक्ति और मरे ज़ज्बात हैं
तीज त्योहारों पे अक्सर मिलना होता था जहाँ
अब मानते हैं अकेले ऐसे क्यों हालात हैं
दोस्तों का साथ छूटा , रिश्ते-नाते सब जुदा
जा रहे हैं हम कहाँ दौलत की अंधी दौड़ में
दोस्तों-रिश्तों का फिर मैं प्यार पाना चाहता हूँ
आज फिर से ज़िन्दगी मैं तुझको जीना चाहता हूँ ॥

॥आखिर॥ 

Wednesday, June 3, 2015

हर कोई अब सो रहा है?

ज़िन्दगी को आदमी ना जाने कैसे जी रहा है
कोई रोता हंस रहा है कोई हँसता रो रहा है
कोई तडपे या मरे किसको फ़िक्र इस बात की
चलती-फिरती लाशे है या हर कोई अब सो रहा है॥

आदमी ही आदमी को हर कदम है काटता
आदमी ही आदमी पर चढ़ दिशाएं नापता
दूसरों को रख के भूखा चैन से कोई जी रहा है
चलती-फिरती लाशे है या हर कोई अब सो रहा है॥

बांटते है खुद को हम जाती-धरम के नाम पर
काटते है खुद को हम धर्मों-करम के नाम पर
खून से लथपथ ज़मीं पर खुशियां कोई बो रहा है
चलती-फिरती लाशे है या हर कोई अब सो रहा है॥

हर सुबह उठता हूँ मैं अल्लाह-प्रभु के नाम पर
कुछ कदम चलता हूँ मैं एक उसकी उंगली थाम कर
रहने को महले-दुमहले दिखते हैं हर मोड़ पर
और बगल दिखता है जीवन धूप में तपते हुए
आते जाते हर कोई उसको है ऐसे देखता
जैसे के वो सिर्फ एक पत्थर पड़ा हो राह पर
देखकर इन दृश्यों को ऐसा है लगता ए-खुदा
रेत पर लिख कर तू "इंसान" लहरों से अब धो रहा है
चलती-फिरती लाशे है या हर कोई अब सो रहा है॥

॥आखिर॥