Friday, December 11, 2015

तुझे देखूँ नहीं जब तक।

तुझे देखूँ नहीं जब तक ये दिल बेबस सा रहता है
तुझे जब देख लेता हूँ अजब सा चैन पाता हूँ।।

झुक जाता है तुझको देख कर सजदे में सर मेरा
तेरी हर एक झलक में मैं खुदा का नूर पाता हूँ।

ना जाने क्या कशिश है तेरी आँखों में मेरे हमदम
मैं खुद-ब-खुद तेरी आगोश में खिचता सा आता हूँ।।

समंदर की लहर सा ही हिलोरे मैं भी लेता हूँ
तेरे धीरज से टकराकर मचलना भूल जाता हूँ।।

ये दो कमरों का घर और ये सुलगती जिंदगी मेरी
चले आओ कि तुम बिन मैं इसे सूना सा पाता हूँ।।

गुजर जाती है रातों को कुछ ऐसे जिन्दगी अपनी
बहुत सी यादें रहती हैं जरा सी नींद पाता हूँ ।।

ये कैसी हसरतें हैं और कैसी ख्वाहिशें "आखिर"
मै अपनी हर दुआओं में फकत तुझको ही पाता हूँ।।

।।आखिर।।

Sunday, November 15, 2015

आए थे इंसान बनने!

आए थे इंसान बनने
दुनिया ने बाँट दिया
कुछ पूरब गये कुछ पश्चिम
जो बचे उन्हें मजहब ने बाँट दिया।।

अब आए दिन लड़ते हैं एक दूजे से
कभी मकान के नाम पर कभी दुकान के नाम पर
कभी ईश्वर के नाम पर कभी अल्लाह के नाम पर
पर लड़ते नहीं देखा कभी इंसान को इंसान के नाम पर।।

अब बिकती है नफरत सरे आम खुले बाजार में
मोहब्बत हो गई है कैद ना जाने किस दुकान में
कि हर तरफ सुनाई पड़ता है चीखों-चिल्लाहटों का शोर
यूँ लगता है जिंदगी महफूज है तो सिर्फ श्मशान में।।

जिस ओर जाओ बस मार-काट मचा रखा है
हर शहर को कंकालों से सजा रखा है
कि अब रोती है जिंदगी हर शाम हर सुबह
लोगों ने ये कैसा माहौल बना रखा है।।

ना जाने कैसी हैवानियत लोगों पर छाई है
क्यों हर चौराहे पर मौत का व्यापार लगा रखा है?
जहां बिकती हैं जिंदगियाँ कौड़ियों के दाम पर
इस अनमोल सी चीज का क्या हाल बना रखा है।।

हर रोज जलती हैं जिंदगियाँ इस नफरत की आग में
कि हर तरफ हमने कत्ल-ए-आम मचा रखा है
और कैसे ना हो दूषित, "गंगा" हर देश की
हमने स्वार्थ की खातिर इंसानियत का खून बहा रखा है।।

बड़ी असमंजस में हुँ जियूं कि ना जियूं
कि आँखों में कई अरमान सजा रखा है
पर ना जाने कब आलिंगन कर ले मौत मेरा "आखिर"
लोगों ने हर कदम पर बारूद बिछा रखा है।।

।।आखिर।।

Monday, November 9, 2015

मनाना चाहता हूँ हर एक त्योहार मैं घर में
रहना चाहता हूँ हर खुशी में घर के आँगन में
मगर ना जाने कैसी जिंदगी ये हो गयी "आखिर"
कि घर से दूर हूँ मैं साथ ना परिवार मेरा है
मना मैं भी रहा हूँ आज का त्योहार सबके संग
मगर दिल कह रहा है आज ना त्योहार मेरा है।।

।।आखिर।।

Thursday, November 5, 2015

लोकतंत्र ही आफत है।।

कितना अच्छा देश है मेरा, उफ़ कैसी ये सियासत है
यूँ लगता है लोकतंत्र में लोकतंत्र ही आफत है।।

हम जीते स्वछंद पवन में एक दूजे का साथ लिए
हम जीते अपनी मर्जी से जीने का अधिकार लिए
वो अधिकार जिसे हम सब में संविधान ने बाँटा है
वो अधिकार कि जिनके कारण भारत भाग्य विधाता है
पर ना जाने क्यों आपस में हम टकराये रहते हैं
हर लम्हा हम क्यों एक दूजे पर गुर्राये रहते हैं
लगता है हमको बहका के करता कोई सियासत है
यूँ लगता है लोकतंत्र में लोकतंत्र ही आफत है।।

कहने को आजाद हैं हम जाने कैसी आजादी है
हर चौराहे हर नुक्कड़ पर जीवन की बर्बादी है
तीखी धूप भले हो कितनी या कितनी ही ठंड पड़े
जलते बुझते से इंसान दिख जाते हैं सड़कों पर पड़े
जिनकी हालत से अच्छी सड़कों की हालत लगती है
जिनमें कोई छेद हुआ तो सरकार मरम्मत करती है
इंसानों का मोल गिराती सरकारें या सियासत है ?
यूँ लगता है लोकतंत्र में लोकतंत्र ही आफत है।।

यूँ तो भारत में रहने वाले सब एक समान हैं
कोई छोटा है ना बड़ा जब तक ये हिंदुस्तान है
पर ये सब कहने की बातें असल अलग कुछ होता है
भारत में तो सबसे उपर केवल नेता होता है
जिनको चुन कर के संसद में हमने भेजा होता है
और जब उनकी पड़े जरूरत तभी नदारद होता है
पाँच साल तक भारत पर वो करता यूँ मनमानी है
भारत उसके पुरखों की जागीर दिखाई देता है
संसद में भेजे सेवक को राजा करती सियासत है
यूँ लगता है लोकतंत्र में लोकतंत्र ही आफत है।।

।।आखिर।।

Friday, October 30, 2015

चाँद का इंतजार

ऐ चाँद आज मेरी एक हसरत पूरी कर दे
ज़रा निकल कर बादलों से मेरा चाँद भी रोशन कर दे।

वो भूखा है सुबह से मेरे प्यार मे
कुछ मुरझा सा गया है तेरे इंतजार में
अब देर ना कर ना सता उसे
आ जा फलक पर बादलों को चीर के
ऐसे मिल कि उसकी तपस्या पूरी कर दे
ऐ चाँद! मेरा चाँद रोशन कर दे।।

यूँ तो मैं भूखा नहीं हूँ सुबह से
जरा सा खा रखा है
उसने प्यार से जो सेंकी थी रोटियां तवे पर
उसका लुत्फ उठा रखा है
पर फिर भी बेचैन हूँ मै उससे ज्यादा
क्योंकि तूने ऐ चाँद उसे अब तक भूखा रखा है
बस ना कर अब और शैतानी तू और आ जा सामने
तुझे देख कर वो अपना जी भर ले
कुछ खा ले हँस ले और खुद को झिलमिल कर ले
ऐ चाँद! मेरा चाँद रोशन कर दे।।

।।आखिर।।

Tuesday, September 22, 2015

जाने कब?

इस दुनिया की भाग दौड़ से मिलेगी फुर्सत जाने कब?
जाने कब आराम करूँगा आँख लगेगी जाने कब?

हर पल पैसे के पीछे बस भाग रहा है क्यों इंसान
न जाने कैसी तृष्णा ये भूख मिटेगी जाने कब ?

एक दूजे के खून का प्यासा जाने क्यों है अब इंसान
न जाने कैसे फैला ये द्वेष मिटेगा जाने कब ?

नहीं बोलता है इंसान अब कुछ भी अत्याचार पर
जागती आखें पर सोया इंसान उठेगा जाने कब?

कोई भी अब मदद न करता भूखे की लाचार की
बन गए है अब सब मुरीद बस मिथ्या के व्यापार की
अब सब को एक बड़ी सी गाड़ी,बंगला ,पैसा चाहिए
अब परवाह करता ही कौन है इस अदने से "प्यार" की
"सेवा परमो धर्मः" का जो गीता में था ज्ञान मिला
उसको अपना करके हम इंसान बनेंगे जाने कब ?

"आखिर" बस ख्वाहिश करता है ऐसे एक जहान की 
जहाँ ना हो कोई धर्म न जाती कीमत हो इंसान की 
जहाँ ना हो कोई बेबस न कोई भूखा रहे निवालों को 
जहाँ बसे बस प्यार दिलों में खुशियाँ हो रुखसारों पर 
जहाँ हर एक व्यक्ति के दिल में सेवाभाव की सोच बसे 
रामराज्य के जैसा मेरा देश बनेगा जाने कब?

॥आखिर॥ 

Thursday, August 20, 2015

अब तक कोई शिकायत ना थी तुझसे ऐ जिन्दगी
फिर कल उसे देखा और प्यार हो गया।।

जो कल तक धड़कता था सीने में मेरे
वो दिल आज सर पर सवार हो गया।। 

ना कुछ करता है ना कुछ करने देता है
जाने क्या धुन इसपर सवार हो गया।।

मेरी सारी दुआ हो गई बेअसर, क्या करूं
ये जाने कैसा बीमार हो गया।।

हर पल हर लम्हा बस कहता रहता है कि
ज्यादा मत सोच "आखिर"तुझे भी प्यार हो गया।।

।।आखिर।।

Saturday, August 15, 2015

मैं भारत माता हूँ

अदभुत अनमिट अमर अटल जनजीवन की अभिलाषा हूँ
लोकतंत्र की पराकाष्ठा मैं तो भारत माता हूँ।।

मैं आशा हूँ उस गरीब की जिसके पास दुकान नहीं
जो रहता है भूखा-नंगा जिसके पास मकान नहीं
जो अपना जीवन सारा मजदूरी में खो देता है
जाडा गर्मी या हो बारिश कभी नहीं जो सोता है
जिसकी आँखों में उसके बच्चों के सपने जीते हैं
उनको खुशियां देने को जो हर गम हँस के पीते हैं
मैं इन सबके बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की आशा हूँ
लोकतंत्र की पराकाष्ठा मैं तो भारत माता हूँ।।

मैं आशा उन बच्चों की जिनका कहीं घर खो जाता है
जिनके ना होते माता-पिता सडकों पर रात बिताता है
जो दिनभर मजदूरी कराता है या फिर भीख कमाता है
और इन सबके बीच कहीं जिसका बचपन खो जाता है
मैं उन बच्चों के भी पढ़ने-लिखने की अभिलाषा हूँ
लोकतंत्र की पराकाष्ठा मैं तो भारत माता हूँ।।

मैं आशा उन लोगों की जो मंदिर-मस्जिद जाता है
जो कुरान के कलमे पढता ईश्वर के गुण गाता है
जो नहीं देखता धन और दौलत धरम करम के नाम पर
खुद खाता सूखी रोटी ईश्वर को दूध चढ़ता है
जो अपनी मंजिल को जन्नत या फिर स्वर्ग बताता है
जिसके नाम पर इनको नेता-धर्मगुरू बहकाता है
फिर फिजूल की रंजिश में जो आपस में टकराता है
कभी-कभी ये एक-दूजे का सर्वनाश कर जाता है
मैं इनके भी भीतर ज़िंदा एक अमन की आशा हूँ
लोकतंत्र की पराकाष्ठा मैं तो भारत माता हूँ।।

मैं आशा उस सेनानी की जिसने सब कुछ त्याग दिया
मुझे स्वतंत्र करने की कोशिश में प्राणों को त्याग दिया
मै आशा हूँ उस "गाँधी" की जो गरीब पर मारता था
सत्य अहिंसा सत्याग्रह कर अंग्रेजों से लडता था
मैं आशा हूँ उस "कलाम" की जो मेरी सेवा करता
मैं सशक्त बनू इसकर के नित नये प्रयोजन कराता था
मैं आशा हूँ उस जवान की जो सीमा पर लडता है
मैं स्वछंद रहूँ इस खातिर अथक परिश्रम करता है
गंगा जमुनी की तहजीब में जन्मी प्यार की भाषा हूँ
लोकतंत्र की पराकाष्ठा मैं तो भारत माता हूँ।।

।। अाखिर।।

Saturday, July 18, 2015

कुछ चाहतें

इस दुनिया में जीने का कुछ आधार चाहिए
दो जून की रोटी ज़रा सा प्यार चाहिए ॥

हमको नहीं है शौख महलों और दुमहलों के
एक छोटी सी कुटिया में एक परिवार चाहिए ॥

हर एक दुआ खुदा करेगा तेरी मुकम्मल
उन सब दुआ में बस तेरा ईमान चाहिए ॥

हमने बनाया था जिन्हे सद्र-ए-जम्हूरियत
वो आज हमसे पूछते है कौन चाहिए ?

कैसी रियासतें हुईं कैसी सियासतें
मजहब के नाम पर जिन्हे व्यापार चाहिए ॥

हिन्दू हूँ मैं मुस्लिम हूँ मैं ही सिख-ईसाई
तू बोल किससे मिलना है क्या काम चाहिए ॥

मज़हब से मुझे जोड़ के न देख सितमगर
इंसान हूँ इंसान सा व्यवहार चाहिए ॥

हर ओर क़त्ल-ए-आम मजहब के नाम पर
न जाने कहाँ खो गया इंसान चाहिए ॥

भटका हूँ दर-बदर यहाँ इंसान की खोज में
अब प्यास सी लगी है साकी जाम चाहिए ॥

जब पहुँचूँगा जीवन के मैं "आखिर" पड़ाव पर
एक कब्र-ए-मुक़र्रर में बस आराम चाहिए ॥

॥आखिर॥ 

Thursday, July 16, 2015

प्यार बाकी है

निगाहें हैं मिली जबसे ये दिल बेकरार काफी है
मोहब्बत हो गयी इसको मगर इकरार बाकी है ॥

कभी आओ मिलो हमसे ख्वाबों के अलावा भी
कि दो अल्फाज़ो में इस प्यार का इज़हार बाकी है ॥

उन्ही आँखों को ढूंढें दिल हर एक पर्दानशीं में अब
कभी चिलमन तो बिखराओ अभी दीदार बाकी है ॥

मगर डरता हूँ तेरा चाँद सा चेहरा जो देखा तो
कहीं मैं ईद ना कर लूँ अभी रमज़ान बाकी है ॥

तेरे हुजरे में तेरा चाँद एक दिन आएगा "आखिर"
ज़रा तो सब्र कर अब भी उमर तमाम बाकी है ॥

जब से साथ तू है इल्म न मुझको है मौसम की
शायद दिन ढला है और अभी तक रात बाकी है ॥

अभी तो आये हो और फिर अभी ये हिज्र की बातें
ज़रा कुछ देर तो ठहरो वस्ल की रात बाकी है ॥

जहाँ में है पता सबको ये मेरी राज़-ए-ख़ामोशी
फकत तू ही न समझे है तेरा कि प्यार बाकी है ॥

||आखिर|| 

Friday, June 19, 2015

ज़िन्दगी जीना चाहता हूँ

था अभी तक मैं डरा सा और सहमा सा ज़रा
था अभी तक व्यर्थ की चिंता में मैं डूबा रहा
थी अभी तक मेरे हंसने-रोने पर पाबंदियां
थे मेरे भी पर मगर चलता थे ले पगडंडियां
मुश्किलों को ताख पर रख खुल के उड़ना चाहता हूँ
आज फिर से ज़िन्दगी मैं तुझको जीना चाहता हूँ ॥

चाहता हूँ हंसना थोड़ा और रोना भी ज़रा
चाहता हूँ उड़ना थोड़ा और गिरना भी ज़रा
चाहता हूँ मैं समय सा ही सदा चलता ही जाऊं
चाहता हूँ मैं ना रुकना और सुस्ताना ज़रा
इस तरह मैं बिन रुके ,जीवन पे चलना चाहता हूँ
आज फिर से ज़िन्दगी मैं तुझको जीना चाहता हूँ ॥

चाहता हूँ तारा बनना फिर किसी की आँख का
चाहता हूँ प्यार पाना मैं हर एक हालात का
चाहता हूँ फिर से मेरे सर पे कोई हाथ फेरे
चाहता हूँ कोई दे आशीष मुझको हर दफा
फिर मैं माँ की गोंद में सर रखकर सोना चाहता हूँ
आज फिर से ज़िन्दगी मैं तुझको जीना चाहता हूँ ॥

चाहता हूँ मैं किसी आँखों से आँखें चार करना
चाहता हूँ मैं उन्ही में डूबना और फिर उतरना
चाहता हूँ कोई मेरे साथ जीवनभर चले
चाहता हूँ मैं ज़माने में किसी से प्यार करना
आज खुद को प्यार का मैं तोहफा देना चाहता हूँ
आज फिर से ज़िन्दगी मैं तुझको जीना चाहता हूँ ॥

इस ज़रा सी ज़िन्दगी के कुछ अलग हालात हैं
व्यस्त है हर एक व्यक्ति और मरे ज़ज्बात हैं
तीज त्योहारों पे अक्सर मिलना होता था जहाँ
अब मानते हैं अकेले ऐसे क्यों हालात हैं
दोस्तों का साथ छूटा , रिश्ते-नाते सब जुदा
जा रहे हैं हम कहाँ दौलत की अंधी दौड़ में
दोस्तों-रिश्तों का फिर मैं प्यार पाना चाहता हूँ
आज फिर से ज़िन्दगी मैं तुझको जीना चाहता हूँ ॥

॥आखिर॥ 

Wednesday, June 3, 2015

हर कोई अब सो रहा है?

ज़िन्दगी को आदमी ना जाने कैसे जी रहा है
कोई रोता हंस रहा है कोई हँसता रो रहा है
कोई तडपे या मरे किसको फ़िक्र इस बात की
चलती-फिरती लाशे है या हर कोई अब सो रहा है॥

आदमी ही आदमी को हर कदम है काटता
आदमी ही आदमी पर चढ़ दिशाएं नापता
दूसरों को रख के भूखा चैन से कोई जी रहा है
चलती-फिरती लाशे है या हर कोई अब सो रहा है॥

बांटते है खुद को हम जाती-धरम के नाम पर
काटते है खुद को हम धर्मों-करम के नाम पर
खून से लथपथ ज़मीं पर खुशियां कोई बो रहा है
चलती-फिरती लाशे है या हर कोई अब सो रहा है॥

हर सुबह उठता हूँ मैं अल्लाह-प्रभु के नाम पर
कुछ कदम चलता हूँ मैं एक उसकी उंगली थाम कर
रहने को महले-दुमहले दिखते हैं हर मोड़ पर
और बगल दिखता है जीवन धूप में तपते हुए
आते जाते हर कोई उसको है ऐसे देखता
जैसे के वो सिर्फ एक पत्थर पड़ा हो राह पर
देखकर इन दृश्यों को ऐसा है लगता ए-खुदा
रेत पर लिख कर तू "इंसान" लहरों से अब धो रहा है
चलती-फिरती लाशे है या हर कोई अब सो रहा है॥

॥आखिर॥ 

Friday, April 3, 2015

मोहब्बत में ज़रा सा आज खुद को आज़माने दे

मोहब्बत में ज़रा सा आज खुद को आज़माने दे
तेरे दिल में मुझे भी एक छोटा घर बनाने दे ॥

तेरी मुस्कान मेरे होठो की मुस्कान बन जाए
तेरी आँखों के आंसू को मेरी पलकों पे आने दे ॥

बहुत अच्छा है लगता चाँद तारों में सजा लेकिन
इसे एक दिन की खातिर मेरे आँगन को सजाने दे ॥

जो जलते हैं दिए हर शाम तन्हाई के आलम में
तेरी मौजूदगी में इनको धीरे से बुझाने दे ॥

मोहब्बत के कई अफ़साने हमने थे सुने अब तो
हमे भी बन के राँझा कोई अफ़साना बनाने दे ॥

अभी तक काफिरों सा दर-बदर भटका था मैं 'आखिर'
मोहब्बत को मेरा ईमान तुझको रब बनाने दे ॥

||आखिर||


Friday, February 13, 2015

Happy Valentines Day... ☺☺☺

इस दुनिया में हैं लोग बहुत बातों हल्ला-गुल्ला है
जहाँ खामोशी भी बात करे बस प्यार का वही मोहल्ला है।

जहाँ प्यार की मीठी बातों में हर कोई खोया रहता है
जहाँ एक दूजे की बाहों में हर कोई सोया रहता है
जहाँ बिन बोले ही इस दिल के हालात सुनाई देते हैं
जहाँ आँखें बातें करतीं हैं जज़बात दिखाई देते हैं
उसकी जुल्फों के साए में जहाँ धूप सुहानी लगती है
जहाँ रातों को चंदा डोली में तारों संग उतरती है
जहाँ झगङों में भी प्यार की ही बातों का हल्ला-गुल्ला है
जहाँ खामोशी भी बात करे बस प्यार का वही मोहल्ला है।

Thursday, January 22, 2015

ज़रा सी बात को दिल से लगा के बैठे हैं

ज़रा सी बात को दिल से लगा के बैठे हैं
एक मुद्दत से वो नज़रें चुरा कर बैठे हैं ॥

ए चाँद आज उतर , जा के ये बता उनको
हम उनकी याद में नींदे गवां के बैठे हैं ॥

ना जानते हैं वो शायद मेरा हाल-ए-दिल
हम उनकी राह में पलकें बिछा के बैठे हैं ॥

दे ना पाये कोई इलज़ाम ये ज़माना तुमको
इसलिए खुद को ही झूठा बना के बैठे हैं ॥

एक तेरे जाने के गम को छुपाने की खातिर
कई हँसते हुए चेहरे लगा के बैठे हैं ॥

प्यार क्या कोई करेगा तुम्हे हमसे ज्यादा
हम तेरे नाम को अपना बना के बैठे हैं ॥

यूँ तो बिखरे से हैं अरमान मगर तू है दिल में
इसलिए आज भी ये दिल सजा के बैठे हैं ॥

॥आखिर॥