Sunday, August 31, 2014

ये तेरी याद है

कभी हंसाती है हमें तो कभी रुला भी जाती है
ये तेरी याद है , वक़्त बेवक़्त आ ही जाती है ॥

कभी लड़ती है मुझसे बहुत छोटी सी बात पे
कभी होती है गुस्सा मेरे हालत पे
मेरे दिन बनाती है कभी
तो कभी बिगाड़ भी जाती है
ये तेरी याद है , वक़्त बेवक़्त आ ही जाती है ॥

ये देखती नहीं है सुबह और शाम को
मेरी थकावट और मेरे आराम को
चुपचाप धीरे से मेरी दुनियां में आकर
ये अपना काम कर ही जाती है
ये तेरी याद है , वक़्त बेवक़्त आ ही जाती है ॥

ना जाने कितनी बार टोका है मैंने खुद को
ना जाने कितनी बार रोका है मैंने इसको
की ना आया कर यूँ मेरे ख्वाबों-खयालो में
पर हर बार ये मुझे दरकिनार कर ही जाती है
ये तेरी याद है , वक़्त बेवक़्त आ ही जाती है ॥

॥आखिर॥

Wednesday, August 27, 2014

आज मौसम ने करवट ली है कुछ

आज मौसम ने करवट ली है कुछ
हवाएँ भी भीगी-भागी सी लग रही है
एक टीस फिर से उठी है दिल में मेरे
तेरी आरज़ू फिर जागी-जागी सी लग रही है ॥

अब हर नज़ारे में मुझे तू ही दिखता है
मेरी सूरत भी अब तेरी परछाई सी लग रही है
तेरे नैन-नक्स के तो कई अफ़साने थे मगर
तेरी बातें भी अब रुबाई सी लग रही हैं ॥

आज आसमां भी तेरे रंग सा गुलाबी है
ये हवाएँ भी किसी शराबी सी लग रहीं हैं
इन घटाओं ने लिया है तेरी गेसुओं का रंग
ये बूँदें भी अब कुछ नवाबी सी लग रही हैं ॥

तेरे चेहरे का नूर लाजवाब है मगर
तेरी बिंदिया भी आज आफ्ताबी सी लग रही है
तेरी आखों का सुरमा , तेरे होठों की लाली
तू तारों से सजी शाहज़ादी सी लग रही है ॥

यूँ बन-संवर के आई है तू मेरी दुनिया में
तू मेरे ख़्वाबों की सच्चाई सी लग रही है
और मेरी कैफियत का अंदाज़ा नहीं है तुझे "आखिर"
किस कदर मेरी साँसें आज इन्कलाबी सी लग रहीं हैं ॥

॥आखिर॥

Saturday, August 23, 2014

तुझे ही ढूंढता हूँ और तेरी ही बात करता हूँ
न जाने क्यों यही हरकत मैं अब दिन-रात करता हूँ
नहीं आता सुकून दिन में नहीं अब चैन रातों को
की ख्वाबों में तुझे मिलने की ख्वाहिश यार करता हूँ ॥ 

Friday, August 15, 2014

!!मेरी आकांक्षा!!

ऐ-खुदा! मेरे जीवन में फकत ये आदत लिखना
जिऊं मैं वतन के लिए और मौत में शहादत लिखना ॥

ना मिले मुझे दो गज ज़मीन तो कोई गम नहीं
बस कफ़न में एक तिरंगा की चाहत लिखना ॥

मैं हिन्दू बनु या मुस्लमान ,या सिख या ईसाई कोई फर्क नहीं
बस फितरत में मेरी , मेरे वतन की इबादत लिखना ॥

ना रहे मेरा मुल्क किसी की गुलामी में
मेरे हमवतन की किस्मत में सिर्फ बादशाहत लिखना ॥

भूखा-नंगा ना रहे कोई वतन में मेरे
सब के नसीब में इतनी तो राहत लिखना ॥

मंदिरों और मस्जिदों ने सिर्फ बांटा है हमे अबतक
अबके बार उनमे भी जोड़ने की आदत लिखना ॥

जी सके सब लड़कियां सम्मान की एक ज़िन्दगी
मेरी साँस के हर कतरे पर उनकी हिफाज़त लिखना ॥

इतना करम "आखिर" में मुझ पर और करना ऐ-खुदा!
मेरे हर जनम में देश का एक नाम बस "भारत" लिखना ॥

॥आखिर॥

Monday, August 11, 2014

ज़रूरत है तेरी , तेरा तसव्वुर यार रहता है
ज़मी से उस फलक तक अब तू ही बस यार दिखता है
तू है महताब जीवन का मेरे अब जान ले ये तू
तू जितनी दूर हो उतना ही तुमसे प्यार रहता है ॥

॥आखिर॥ 

Saturday, August 9, 2014

कहीं खुद से शिकायत है कहीं तेरी इनायत है
तेरी दी ज़िन्दगी हर एक कदम पर जीने लायक है ॥

कभी ये खुशनुमा होती है तो हमको हंसती है
कभी ये रूठ जाती है तो संग हमको रुलाती है
हैं गर खुशियां भरी इसमें तो गम भी सहने लायक हैं
खुदा ये ज़िन्दगी हर एक कदम पर जीने लायक है ॥

Tuesday, August 5, 2014

तेरी पलकों के किनारे से
एक हाँ का इंतज़ार मैं आज भी करता हूँ
तेरी बाँहों के दरमियान जो बीते कभी
उस शाम का इंतज़ार आज भी करता हूँ
तू मेरे इश्क़ की इब्तिदा है
इबारत भी तू ही है "आखिर"
इबादत तेरी ही की है कि
तुझसे प्यार मैं आज भी करता हूँ ॥

॥आखिर॥

Friday, August 1, 2014

#अकेला_छोड़_आया_हूँ

बचपन के वो दिन जब हम ख़ुशी से झूमा करते थे
किसी काँधे पे चढ़ कर रोज़ मीलों घूमा करते थे
थी कुछ उँगलियाँ जिसने हमे चलना सिखाया था
गिरे जब भी सफर में हम तो एक आँचल का साया था
ना जाने क्यों ली करवट वक़्त ने यूँ दूर हम हुए
वो बातें अब फकत यादों सी हमको आ रुलाती है
मैं शर्मिंदा सा हो जाता हूँ उनका हाल-ए-दिल सुनकर
समय की दौड़ में जिनको अकेला छोड़ आया हूँ ॥

॥आखिर॥