Sunday, July 27, 2014

ऐ-खुद क्या वक़्त तूने अब दिखाया है
मेरी चौखट पे मेरी मन्नतों को लेकर आया है ॥

वो एक ख्वाहिश मेरे दिल की जो बरसों से अधूरी थी
सताकर मुझको इतना अब मुझे उस से मिलाया है ॥

मेरी आँखों में आंसू है तो ये दिल खुश भी है बड़ा
के रागों का अजब संगम मेरे मन पे यूँ छाया है ॥

और बद्नसीबियों के दौर से शिकवा नहीं है अब
कि खुशनसीबी ने मुझे अपने बनाया है ॥

कैसे करेगा शुक्रिया "आखिर" , मेरे मुर्शिद
दुआ मेरी कुबूली है , ये सर सिजदे झुकाया है ॥

है ये सुरुआत बस इसको समझना अंत न हमदम
अभी तो वक़्त है, मेरा भी सूरज जगमगाएगा ॥

॥आखिर॥ 

Thursday, July 24, 2014

जितने अपने थे सब बेगाने हो गए
तेरे जाते ही महफ़िल वीराने हो गए ॥

जो कल तक थी बस तेरे मेरे दरम्यान
वो सारी बातें अब अफसाने हो गए ॥

अब तक तुझमे ही देखि थी अपनी सूरत
आदत यूँ पड़ी कि आईने बेमाने हो गए ॥

तेरी बाँहों की गर्मी में जो पिघलता था मेरी रात का चाँद
आज वो तेरी यादों के सिरहाने हो गए ॥

और तू गया दूर यूँ कर कि सुधुरुंगा मैं "आखिर"
पर अब तो हम तेरे और भी दीवाने हो गए ॥


||आखिर||


Wednesday, July 23, 2014

ऐ खुदा वक़्त कुछ वो भी मेरे दर आये
मैं भी खुश हो सकूँ ऐसा कोई मंज़र आये ॥

जो मेरा यार है मुफ़लिस नसीबदारों में
एक ख़ुशी का ज़र्रा तो उसे नसीब आये ॥

तू जियादत्ति और न कर उसकी मेहनत पर ऐ-खुदा !
एक कामयाबी उसे भी तो मुक़र्रर आये ॥

और जाने ये ज़माना भी मेहनत के नतीज़ों को
कि उसके हौसलों में भी तो "आखिर" उड़ान आये ॥

॥आखिर॥

Monday, July 21, 2014

जीवन के सफर में अब तलक कई मोड़ आये है
मिला है कुछ हमे और हम बहुत कुछ छोड़ आये हैं
वो एक आदत जिसे जीवन में हमसाथी बनाया है
वो एक आदत हसीं जिसने हमे इंसान बनाया है
की जिसके दम पे औरों के ग़मों को दिल लगाया है
की बांटी है ख़ुशी भी हमने इसको आज़माने से
वो लिखने का जूनून 'आखिर' में अपने साथ लाये हैं ॥ 

Saturday, July 12, 2014

अरे जीवन की ख़ामोशी अनेकों राज़ कहती है
कभी अंजाम कहती है कभी आगाज़ कहती है ॥

अजब हैं लोग इसमें और अजब दस्तूर इसका है
सुनो तुम गौर से ये सब हकीकत आज कहती है ॥

सितारों की बुलंदी पर पहुंचना यूँ नहीं मुमकिन
बड़ा संघर्ष है पथ में ये तुमको आज कहती है ॥

हुई जीवन की है शुरुआत तो किलकारियों से पर
तुझे मारना है ख़ामोशी से 'आखिर' यार कहती है ॥

Tuesday, July 8, 2014

तू थी खुशबु के जैसी हवा में घुली
मैं तो भंवरे सा दर-दर भटकता रहा
चाहतो में तेरी डूबा कुछ इस कदर
तू थी मृगतृष्णा ये मैं समझ न सका
ढूंढते-ढूंढते वक़्त बहता गया
तेरी हसरत भी हर लम्हा बढ़ती गयी
अब उम्र जो ढली तो पता ये चला
मैं तेरे बिन न एक डग कभी था चला ॥ 

Monday, July 7, 2014

तेरी नज़रों से नज़रें मिलाना अच्छा लगता है
तेरा धीरे से यूँ मुस्कुराना अच्छा लगता है
यूँ तो बहुत है अफ़साने मोहब्बत के इस दुनिया में 'आखिर'
मगर पलकें झुका कर हाय!, तेरा शर्माना अच्छा लगता है ॥
||आखिर ||

Thursday, July 3, 2014

मुझे कुछ याद नहीं या 
बातों में तेरी खो गया हूँ 
नींद आती नहीं थी मुझको पर 
आज तेरी बाहों में सो गया हूँ 
है तेरे इश्क का खुमार या नशा शराब का
कि मैं क्या था और अब क्या हो गया हूँ ||

Wednesday, July 2, 2014

तेरे मेरे चाहने से क्या होगा 'आखिर'
मिलता वही है जो नसीब में रहता है
और वो भी देखेगा कभी मुफलिसी का आलम
जो आज हमे गरीब कहता है ॥