Saturday, January 25, 2014

हे भारत के आम मनुज !

ना जाओ उस ओर  जिधर
एक भीड़ चली जाती सी दिखे
ना जाओ उस छोर जिधर
एक राह सरल सीधी सी दिखे
पथिक चलो उस ओर जिधर
हो कांटे तेरे पथ में बिछे
लहू-लुहान हो मार्ग तेरा
बस कुछ ही लोग खड़े हो दिखे
सच्चाई का पथ है उसपर
ले सबका आशीष चलो
हे भारत के आम मनुज !
सब मिलकर सच कि राह चलो॥

दम्भ भरो न तुम
अपनी जाती का न अभिमान करो
करम धर्म के नाम पे ना
एक दूजे का अपमान करो
सम्प्रदाय कि आग
ना जाने कितने घर को निगल गयी
न हो कोई अब अनाथ
कुछ इनका समाधान कारो
भाईचारा बढे देश में
ये प्रण लेकर आज चलो
हे भारत के आम मनुज !
सब मिल कर प्रेम कि राह चलो ॥

होड़ लगी है न जाने क्यूँ
पैसा खूब कमाने की
जिस पथ से हो जैसे भी हो
अपना काम बनाने कीं
इस चक्कर में हम सब भैया
भ्रष्ट राह पर चले गए
अब कोशिश करनी है इनको
फिर सुमार्ग पर लाने कि
स्वाभिमान से करें काम हम
ये संकल्प ले आज चलो
हे भारत के आम मनुज !
सब मिल ईमान कि राह चलो ॥

हमने जिनको सदियों पूजा
वो शक्ति है नारी है
आज वही नारी है शोषित
पीड़ित है बेचारी है
ना जाने क्या हुआ हमे कि
हर नर अब व्यभिचारी है
ऐसा लगता है अपनी
सभ्यता पतन कि बारी है
दूर करें इन विकृतियों को
ये कोशिश कर आज चलो
हे भारत के आम मनुज !
तुम सदाचार कि राह चलो ॥

आज हमारे देश में
टोपी कि एक लहर सी छाई है
जिसको देखो टोपी पहने कहता
ये दल भाई है
ये है सच्चा सही वही
ये नारी का रखवाला है
इसके आगे चलने से
ये देश बदलने वाला है
आखिर कहता मत बांधो तुम
खुद को "टोपी-जालों" में
नाम करो न तुम अपना
एक दल को चाहने वालों में
लेकिन तुम ये करो प्रतिज्ञा
अपना फ़र्ज़ निभाओगे
हर एक अत्याचारी को तुम
अब चुनाव हरवाओगे
कि न पंहुचे कोई चोर उचक्का
संसद में ले ये काम चलो
हे भारत के आम मनुज !
सब मिलकर देश कि राह चलो ॥


||शशांक कुमार पाण्डेय 'आखिर'||

Monday, January 20, 2014

जीवन एक दरिया है इसको तैर पार कर जाने को
इस मजलिस में खुद का अपना एक आशियाँ बनाने को
हर महफ़िल में अपनी एक पहचान अलग सी बनाने को
पैर ज़मीं रखो अपने पर ख्वाब फलक तक जाने दो ॥ 

Tuesday, January 7, 2014

प्यार इसी को कहते है शायद !

प्यार इसी को कहते है शायद !
जिसमे कुछ बोले बिना हर बात होती है
मैं इशारे में इज़हार करता हूँ
वो इशारे में इकरार करती है

प्यार इसी को कहते है शायद !
जिसमे न जाने कब दिन कब रात होती है
वक़्त का पता ही कहाँ चलता है
ख़्वाबों में भी तो उनसे बात होती है

प्यार इसी को कहते है शायद!
जिसमे कुछ पाना नहीं बस खोना अच्छा लगता है 
उसके अक्स को आँखों में संजोना अच्छा लगता है 
महफ़िलों का शोर सुनाई देता कहाँ हमे
इसमें तो तन्हाई में रोना अच्छा लगता है । 

प्यार इसी को कहते हैं "आखिर"
जिसमे अपना सब कुछ उसके नाम होता है 
अरे बस यार का नाम रहता है ज़ुबान पर 
आशिक तो गुमनाम होता है । 

प्यार इसी को कहते हैं शायद!