Wednesday, December 31, 2014

Happy New Year

अभी चलते-चलते एक और दिन बीत जाएगा
अपने दामन में समेटे अनगिनत लम्हे ले जायेगा
कही गिरते हुए आंसू कहीं हँसते हुए चेहरे
हर एक बन्दे के जीवन में ये यादें छोड़ जायेगा ॥

कोई उन यादों को सिरहाने रख आंसू बहायेगा
कोई तन्हाइयों में याद कर उन्हें , मुस्कुराएगा
समय के साथ ये मुस्कान , आंसू छुप से  जायेंगे
मगर जीवन समय सा ही सदा चलता ही जायेगा ॥

चलो आओ करें कुछ नया हम अबके साल में
ज़रा सा भूल जाए यादों को हम अबके साल में
हर एक मज़हब को दे सम्मान अब हम अबके साल में
ज़रा सा तो लगें इंसान हम अब अबके साल में
किसी इज़्ज़त पे आये आंच न इस अबके साल में
कोई भुखमरी से ना मरे इस अबके साल में
करे हम कुछ नया अपने लिए पर याद ये रखें
बढ़ाएं मान और सम्मान वतन का अबके साल में ॥

॥आखिर॥ 

Thursday, December 25, 2014

ज़मीं का एक टुकड़ा जो हमे बुद्धू बनता है
कभी मुस्लिम बनता है कभी हिन्दू बनता है ॥
इक उसके मोह में फंस कर प्रभु का नाम लेकर के
कोई मंदिर गिरता है कोई मस्जिद गिरता है ॥
नहीं मिलना है तुझको कुछ नहीं मिलना मुझे कुछ भी
ये टुकड़ा सिर्फ हमको खून का प्यास बनाता है ॥
बहाकर के लहू मासूमों का इस व्यर्थ की ज़िद में
ये टुकड़ा एक ज़ालिम को यहाँ नेता बनता है ॥

॥आखिर॥

Tuesday, December 23, 2014

ए मोहब्बत ! आओ जीने का ये सलीका कर लें
कि खो जाए हम एक दूजे में गैरों से तौबा कर लें
यूँ तो कई उम्र बितायी है मैंने,तुम बिन तनहा मगर
अब ऐसे जिए हम की हर पल को अपना कर लें ॥

॥आखिर॥ 

Saturday, December 20, 2014

चले आओ इधर की अब वहां रहना नहीं है
दरिंदों से भरी दुनिया में अब जीना नहीं है
हरी अब आ भी जाओ और करो संघार दुष्टों का
कि इनकी वहशियत की अब कोई सीमा नहीं है ॥

॥आखिर॥ 

Saturday, December 6, 2014

बहुत खुदगर्ज होती जात है इन हुक्मरानों की
बमुश्किल ही किसी मसले पर इनको दर्द होता है
लहू बहता है सीमा पर जवानों का तो बहने दो
इन्हे कुर्सी से मतलब है सियासत फ़र्ज़ होता है ॥

वो एक निर्जीव सी गोली भी मज़हब भूल जाती है
जब भी चलती है सरहद का सीना छील जाती है
हसूँ बुद्धि पर मैं इनकी या दू दाद ए "आखिर"
जो जाकर के शहीदो में भी मज़हब ढूंढ लाती है
चुनावों का महीना जब कभी आता है दिल्ली में
ये हिन्दू ढूंढ लाती है , ये मुस्लिम ढूंढ लाती है ॥

॥आखिर॥ 

Friday, November 28, 2014

मेरी हसरत

अभी कैसे बताऊँ क्या मेरे इस दिल की हसरत है
ज़रा जीने की हसरत है ज़रा मरने की हसरत है ॥

ज़माने में मेरा अब तक कोई वजूद भी है क्या ?
अदब से नाम ले मेरा ज़माना इतनी हसरत है ॥

कभी कोई गुलाब मेरे भी जीवन को महकाए
किसी के प्यार में खुद को भुला जाने की हसरत है ॥

जहाँ में हो फकत  मेरी वफादारी के ही चर्चे
किसी के साथ पूरी ज़िन्दगी जीने की हसरत है ॥

वो जिसके स्पर्श से हमको मिले जन्नत सी हर खुशियां
हा एक बच्चे की उंगलियां पकड़ चलने की हसरत है ॥

वो जिन लोगो की बिन मेरी शराफत शून्य लगती है
मेरे माता पिता हो खुश मेरी इतनी सी हसरत है ॥

मेरा ओहदा नहीं कर्तव्य हो पहचान इस जग में
मुझे हो चाहने वाले जहाँ में इतनी हसरत है ॥

की हसना और हँसाना बस मेरी फितरत रहे "आखिर"
मेरी मैयात में हँसता हर कोई आये ये हसरत है ॥


॥आखिर॥ 

Wednesday, November 26, 2014

गुनहगारों की महफ़िल में तेरा क्या काम है "आखिर"
चलो उस ओर जाएँ हम जहाँ ईमान बसता हो
बहुत ढूंढा बहुत खोजा मगर ना मिल सका हमको
जहाँ भर में शहर वो एक जहाँ इंसान बसता हो ॥

॥आखिर॥ 

Monday, November 24, 2014

जब से देखा तुझे

जब से देखा तुझे मैं भूल गया हूँ खुद को
देखा है सिर्फ तेरा ख्वाब है चाहा तुझको
एक तेरा साथ मिले मुझको हर कदम इसकर
लाखों सजदे किये दुआ में माँगा है तुझको ॥

तू जो होता नहीं तो जैसे ख़ुशी रूठ जाती है
होठों पे आते-आते हमसे हंसी रूठ जाती है
यूँ न छुप कर के हमे और सता ए हमदम
तेरे मुखड़ा जो ना देखूं तो दुआ रूठ जाती है ॥

चाँद से जब कभी होती है गुफ्तगू अपनी
तेरी बातों में जाने रात कैसे बीत जाती है
तेरी हरकत पे अगर चाँद कभी हँसता है
चांदनी चाँद से झुंझला के रूठ जाती है ॥

जब से देखा है मैंने खुद को तेरी आँखों में
रात भर अब मुझे ये नींद कहाँ आती है
हर घडी बस यही मैं सोचता हूँ क्यों आखिर?
तू नहीं आती है पर याद तेरी आती है ॥

खैर अंजाम जो भी हो इस सफर का अब
संग तेरे चलने में थकान कहाँ आती है
एक तेरा ही मिले साथ हर जनम "आखिर"
तेरी बाँहों के सिवा नींद कहाँ आती है ॥

॥आखिर॥ 

Saturday, November 22, 2014

अक्सर दिन तो कट जाते हैं पर रातें नहीं कटती
काट जाते हैं हर मौसम ये बरसातें नहीं कटती
मोहब्बत में बिताये पल अभी भी याद आते हैं
कि अब भी तेरी आँखों से मेरी आखें नहीं हटती ॥

॥आखिर॥

Monday, November 17, 2014

ज़ुर्रत मैं तुझे भूलने की कर नहीं सकता
मैं प्यार किसी और से अब कर नहीं सकता
उस मोड़ पे लाया है मुझे प्यार तेरा जब
मर कर भी मैं अब तुझसे जुदा हो नहीं सकता ॥

॥आखिर॥

Saturday, November 15, 2014

राहों पर था घुप्प अँधेरा और सड़क का पता नहीं
कहीं कभी जल जाती शम्मा कब बुझ जाये पता नहीं
जीवन दर-दर ठोकर खाकर ऐसे जिया करती थी
किस आंधी में लौ बुझ जाए इसका कोई पता नहीं
फिर मैं एक रस्ते पर चल जीवन से मिलकर आया हूँ
मैं भारत दर्शन करके मैं गाँव देख कर आया हूँ ॥

॥आखिर॥ 

Friday, November 14, 2014

To #life ... :)
मंज़िलों को पाना इतना आसान नहीं होता
कि बिखर जाते हैं इंसान इसे अपना बनाने में
पर ऐसी शख्सियत दी है खुदा ने हमे "आखिर"
हम बाज़ नहीं आते खुद तो आज़माने से ॥

॥आखिर॥

Wednesday, November 12, 2014

अभी तक ढूंढता था मैं उसे जो साथ रह जाये
मैं उसमे डूब जाऊं और वो मेरे पास रह जाए
बड़ी शिद्दत से चाहा है किसी को आज मैंने भी
मैं उसका हो के रह जाऊं वो मेरा हो के रह जाए ॥

॥आखिर॥ 

Tuesday, November 11, 2014

कुछ हो गयी है बात कुछ बात अभी बाकी है
इस प्यार की नयी कई सौगात अभी बाकी है
अभी तो है जवान हुआ ये इश्क़ मेरा अब
ना जाओ छोड़कर मुझे ये रात अभी बाकी है ॥

॥आखिर॥

Saturday, November 8, 2014

तेरी हर आरज़ू में मैं अगर होता तो अच्छा था
हंसी इन वादियों में साथ तू होता तो अच्छा था
तुझे पाने की हसरत ज़िन्दगी जीने नहीं देती
खुदाया तू मुझे अब ख़ाक कर देता तो अच्छा था ॥

॥आखिर॥ 

Thursday, November 6, 2014

आगाज़ हुआ है तो अंजाम भी अच्छा ही होगा
मेरी हर सच्ची कोशीश का परिणाम भी अच्छा ही होगा
धीरे-धीरे ही सही मगर मैं पहुंचूंगा अपनी मंज़िल तक
जीवन के सफर में अपना मुकाम भी अच्छा ही होगा ॥

॥आखिर॥ 

Friday, October 31, 2014

शगुफ्ता हर चेहरे का अलग एक राज़ होता है
कहीं दुःख होते है तो फिर कहीं उत्साह होता है
जो हँसता है , वो खुश होगा , ये तुम मत मानना लोगों
दुःखों को भी छुपाने का ये एक अंदाज़ होता है ॥

॥आखिर॥ 

Monday, October 27, 2014

कहानी में अचानक कल नया एक मोड़ आया है
मेरी हसरत जो चेहरा था वो मेरी ओर आया है
बड़ी मुद्दत से चाहा था जिसे यूँ पास है मेरे
फलक से खुद उतरकर ज्यों कोई महताब आया है ॥

॥आखिर॥ 

Friday, October 24, 2014

दिल में है जूनून और नभ को छूने के इरादे हैं
हम ऊपर से ज़रा टेढ़े हैं दिल के सीधे-सादे हैं
ऐ माटी कर सबर "आखिर" में तुझमे आ मिलेंगे हम
अभी तो पर लगे हैं हम हवा के शाहज़ादे हैं ॥

॥आखिर॥ 

Wednesday, October 22, 2014

ना जाने क्यों खुदा मशरूफ़ियत इतनी अदा कर दी
कि जीवन की हर एक छोटी ख़ुशी इसने हवा कर दी
जो बीता करते थे पल दोस्तों-रिश्तों के दरमियान
समय की दौड़ ने ये ज़िन्दगी उनसे जुदा कर दी ॥

॥आखिर॥ 

Tuesday, October 21, 2014

जिन्हे मिलकर के हम अपने ग़मों को भूल जाते हैं
जिनके साथ हम खुल के हैं हँसते मुस्कुराते हैं
जिनको देखकर फिकरें अचानक भाग जातीं हैं
कि जिनके साथ बीते कल की यादें जगमगातीं हैं
जिन्हे हम राज़ की अपनी हर एक बातें बताते हैं
जो बिन बोले ही अपने हाल-ए-दिल को जान जाते हैं
की जिनसे रोशनी आती है जीवन के अंधेरों में
और जिनके साथ खुशियाँ खुद बखुद दुगनी हो जाती हैं
उन्ही लोगों को अपनी ज़िन्दगी का हाल कहते हैं
उन्ही लोगों से यहाँ दोस्ती पहचानी जाती है ॥

॥आखिर॥

Sunday, October 19, 2014

प्यार मेरा भी सच्चा लगता है

तेरे संग उठती हर सुबह मेरी तुम ना हो तो हो शाम
तेरे बिन मुझको यूँ लगता है जैसे हो सिय बिन राम
यूँ तेरा हर सपने में आना अच्छा लगता है
तुम साथ जो हो तो प्यार मेरा भी सच्चा लगता है ॥

तुम यूँ आये जीवन मेरे जैसे वन में हरियाली हो
तुम तीज मेरी त्यौहार मेरे जीवन की तुम दीवाली हो
सूने जीवन में खुशियां आना अच्छा लगता है
तुम साथ जो हो तो प्यार मेरा भी सच्चा लगता है  ॥

ना देखा है मैंने खुद को कई बरसों से आईने में
तेरी आँखों में ही दिखा हूँ मैं बसता हूँ तेरे सीने में
तेरी परछाईं में खुद को पाना अच्छा लगता हैं
तुम साथ जो हो तो प्यार मेरा भी सच्चा लगता है ॥

मैं करता हूँ बस प्यार तुम्हे तुम जग में सबसे प्यारी हो
जैसे हूँ मैं तेरा "श्याम" प्रिये , तुम मेरी "राधा" प्यारी हो
तुमसे हर पल मिलना हमे कितना अच्छा लगता है
तुम साथ जो हो तो प्यार मेरा भी सच्चा लगता है ॥

तुम बिन ना जाने क्या होगा मेरा इस दुनिया में "आखिर"
तुम सा तो कोई मिलेगा नहीं हो जाऊंगा फिर मैं काफिर
तेरे प्यार में वो ऊपर वाला भी सच्चा लगता है
तुम साथ जो हो तो प्यार मेरा भी सच्चा लगता है ॥

॥आखिर॥ 

Saturday, October 18, 2014

तेरी गुस्ताख़ सी आँखों का ही तो मैं दीवाना हूँ
तेरी बेबाक सी बातों का ही तो मैं दीवाना हूँ
तेरा शर्माना मुझको देखकर हंसकर के छुप जाना
कि इन दिलकश अदाओं का ही तो मैं दीवाना हूँ ॥ 

Monday, October 13, 2014

जीना है जीभरकर इसको अपना यही फ़साना है 
कुछ खुशियां थोड़े गम पीकर "आखिर" तो मर जाना है ॥ 

॥आखिर॥

Sunday, October 12, 2014

आया हूँ अगर दिल में तो इकरार कीजिये
पलकें झुका के प्यार का इज़हार कीजिये
यूँही बीत ना जाये ये अपनी रैना मिलान की
आएं करीब आके ज़रा प्यार कीजिये ॥

॥आखिर॥ 

Saturday, October 11, 2014

याद आती हैं

जो तुझ संग की मुलाकातें तेरे संग बीती जो रातें
हाँ मुझको याद आती हैं तेरी बचकानी सी बातें ॥

वो तेरा रूठ कर मुझसे झगड़ना और ना कुछ कहना
नहीं भूला हूँ मैं तुझको मानते बीती जो रातें ॥

तेरे दो नयन जो मुझसे तेरा हर राज़ कहते थे
तेरे दिल का आइना थीं तेरी हंसती हुई आखें ॥

मोहब्बत थी हमे खुद से जियादा तुमसे ऐ हमदम
गवाही देते हैं नभ के सितारे और ये बरसातें ॥

तू मेरा जाम था सकी था मैख़ाना तू ही मेरा
के मय का एक पियाला थी तेरी इठलाती सी आखें ॥

नहीं मालूम क्यों बिछड़े हैं हम तुम मिल के यूँ आखिर
बहुत ही गूढ़ होती हैं लकीरों की ये सब बातें ॥

करूँ मैं क्या ना तुझको भूल पता मेरा दिल "आखिर"
कि मुझको याद आती है वो हंसती प्यारी सी आँखें ॥

॥आखिर॥ 

Monday, October 6, 2014

बात निकलेगी तो इज़्ज़त की फिकर मत करना
इश्क हो गर तुझे फुरकत की फिकर मत करना
तेरी हसरत अगर मरना इस वतन के लिए
साथ रखना कफ़न मज़हब की फिकर मत करना ॥

॥आखिर॥

Friday, October 3, 2014

ज़िन्दगी की देश में न जाने क्या औकात है
ये तो है बस एक पियादा , शासन की एक बिसात है
गम नहीं कोई मरे बिछड़े किसी से हम यहाँ
इन सियासी भेड़ियों की बस यही तो ज़ात है ॥
एक ही गलती इन्हे करना यहाँ है बार-बार
एक ही तो है बहाना रट के बैठे ये तैयार
जान की कीमत लगते वेश और परिवेश देख
फिर कहीं संवेदना के आंसू गिराते हैं दो-चार
जाने कब समझेंगे ये इतनी से जो ये बात है
इन सियासी भेड़ियों की बस यही तो ज़ात है ॥
॥आखिर॥

Tuesday, September 30, 2014

भूल जाता हूँ

तुझे मैं देखता हूँ और सब कुछ भूल जाता हूँ
के हूँ कौन मैं ये बात अक्सर भूल जाता हूँ ॥

ये तेरी अदाओं का जादू 'काला' ही तो है कि
इनमे फंस कर मैं दुआओं का असर भूल जाता हूँ ॥

ये तेरी कजरारी काली जो झील सी आँखें हैं
मैं इनमे डूबकर हर एक मंज़र भूल जाता हूँ ॥

तेरा ये खुशनुमा चेहरा तेरी ये मीठी सी बातें
मैं इनमे डूबकर सारे ग़मों को भूल जाता हूँ ॥

तेरे गेसुओं की काली घनी छाँव में आकर
मैं चिलचिलाती धूप का असर भूल जाता हूँ ॥

अँधेरी रात के साये में चमचम करती ये बिंदी
मैं इसकी जगमगाहट में सितारे भूल जाता हूँ ॥

तेरा यौवन की जिसने कल ही अठरह साल देखा है
मैं उसके एक नज़ारे पे 'नज़ारे' भूल जाता हूँ ॥

बड़ी फुरसत से उस रब ने उकेरा है तेरे तन को
तेरे आगे मैं खजुराहो की मूरत भूल जाता हूँ ॥

॥आखिर॥

Sunday, September 28, 2014

ज़िन्दगी में बड़ी मुश्किल से वो मुकाम आता है
जब अपना भी लहू अपने वतन के काम आता है
और जो कर गए ज़िन्दगी को रुसवा इस वतन की खातिर
उन शहीदों में अव्वल "भगत" का नाम आता है ॥

॥आखिर॥

Tuesday, September 23, 2014

जाने क्या बात है ?

वो दूर जा रही है अब ! जाने क्या बात है ?
नज़रें चुरा रही है अब ! जाने क्या बात है ?
जो कल तलक हर राज़ बयां करती थीं मुझसे
कुछ तो छुपा रहीं हैं अब ! जाने क्या बात है ?

हूँ मैं वही अब भी मगर ! जाने क्या बात है ?
है प्यार का सफर वही , जाने क्या बात है ?
अब भी धधक रही है इधर आग प्यार की
है बुझ रही शमा उधर , जाने क्या बात है ?

हैं दिन मेरे गुमनाम अब , जाने क्या बात है ?
हैं रातें भी सुनसान अब , जाने क्या बात है ?
करता हूँ आज भी मैं चाँद से तेरी बातें
है खुद पे ही विश्वास काम , जाने क्या बात है ?


॥आखिर॥ 

Thursday, September 18, 2014

बड़ी ही खूबसूरत सी तेरी-मेरी कहानी है

बड़ी ही खूबसूरत सी तेरी-मेरी कहानी है
मैं एक सपने का राजा हूँ तू उस सपने की रानी है
बड़ी ही खूबसूरत सी तेरी-मेरी कहानी है ॥

वो सपना ,
जहां के हर नज़ारे बस तेरी तारीफ करते हैं
जहाँ सूरज भी तारों सा तेरे पीछे चमकता है
जहाँ सुबह तेरी अंगड़ाइयां के संग उठती है
जहाँ रातें तेरी जुल्फों के साये  सिमटती है
तू उस सल्तनत की शाहज़ादी , मेरी रानी है
बड़ी ही खूबसूरत सी तेरी-मेरी कहानी है ॥

जहाँ सुबह तेरी पायल की बूंदों सी छनकती है
जहाँ की ये हवाएँ तेरी साँसों सी महकती हैं
घटायें भी जहाँ तुझको बरस कर छेड़ जाती हैं
जहाँ नदियां तेरे यौवन से मुड़ना सीख जाती हैं
के कुदरत भी तेरी सूरत की सीरत की दीवानी है
बड़ी ही खूबसूरत सी तेरी-मेरी कहानी है ॥

जहाँ हर शाम बाहों में तेरी सब भूल जाता हूँ
जहाँ आँखों में तेरी मैं खुदाई भूल जाता हूँ
जहाँ पर चाँद तेरे सामने फीका सा लगता है
जहाँ बातों में तेरी मैं नज़ारे भूल जाता हूँ
तू मेरे प्यार की पहली और आखिरी निशानी है
बड़ी ही खूबसूरत सी तेरी-मेरी कहानी है ॥

॥आखिर॥ 

Monday, September 15, 2014

कहीं दूर एक चाँद मेरे इंतज़ार में बैठा है
सबकुछ भुला कर वो तनहा मेरे प्यार में बैठा है
ए-हवाओं! ज़रा जाकर उन्हें इस दिल का हाल बताना कि
पलकें बिछाये इस ओर भी कोई उनके इंतज़ार में बैठा है ॥

॥आखिर॥ 

Saturday, September 13, 2014

वो शाम यूँही गुजर गयी तेरे जाने के बाद
जैसे सूख जाते हैं बादल ,बूँदें बरसाने के बाद
गर्मी आयी , सर्दी आयी ,पतझड़ आकर चले गए
न देखा इस दिल ने कोई सावन तेरे जाने के बाद ॥ 

Wednesday, September 10, 2014

ज़िन्दगी हमसे हर कदम पे मिलती रहती है

यूँही गुमसुम सी वो चुपचाप चलती रहती है
अपने दमन में हर एक पल संजोति रहती है
कभी देकर ख़ुशी हमको कभी गम देकर के
ज़िन्दगी हमसे हर कदम पे मिलती रहती है ॥

मेरी मेहनत का सिला मुझको देती रहती है
कामचोरी पे सजा भी दिलाती रहती है
जब चमकता नहीं किस्मत का सितारा अपना
पास आती है , बैठती है , बातें करती है
कहती है हार न मनो पथिक तुम आगे बढ़ो
कई शंघर्षो से भरा तुम्हारा जीवन है
ख़ुशी देकर , सजा , व हौसले को देते हुए
ज़िन्दगी हमसे हर कदम पे मिलती रहती है ॥

उगते सूरज की हर किरण में समायी वो है
दोपहर की भरी गर्मी में समायी वो है
शाम की लालिमा माथे की बिंदी है उसकी
रात की चांदनी में से भीगी , नहायी वो है
इस तरह चाँद को सूरज से यूँ मिलते हुए
ज़िन्दगी हमसे हर कदम पे मिलती रहती है ॥

वो है गर्मी में चलती लू के थपेड़ो जैसी
वो है बरसात के मौसम की पहली बूंदों सी
उसमे है शरद की शीतलहरी सी शीतलता
वो है फाल्गुन में बहती शरारती हवा जैसी
यूँही मौसम के हर एक रंग में बदलते हुए
ज़िन्दगी हमसे हर कदम पे मिलती रहती है ॥

॥आखिर॥ 

Friday, September 5, 2014

ज़िन्दगी जीने की रफ़्तार बदल देता है
आंसुओं को ख़ुशी में यार बदल देता है
जो बदलते नहीं दुनिया की रस्मो की खातिर
उन शरीफों को यहाँ प्यार बदल देता है ॥

॥आखिर॥

Tuesday, September 2, 2014

तेरे ही हम दीवाने हैं!!

गया है दूर जब से तू मेरी आँखों में पानी है
मगर फिर भी ख्यालों में तेरे ही हम दीवाने हैं ॥

तुझे ही ढूंढते हैं हम जहाँ के आशियानों में
कभी सुबह को देवालय तो शामों को मैखाने में
मगर मिलता नहीं जब तू उदासी दिल पे छाती है
छलकते हैं मेरे आंसू हर एक ही शामियाने में
तुझे जब भूलना चाहूँ तो बस ये याद आता है
के दें कैसे भुला उसको के जिसके हम दीवाने हैं ॥

चढ़ा है रंग जो तेरा उतरता क्यों नहीं आखिर
भले धो लूँ मैं खुद को जाके गंगा के मुहाने में
किये थे अनगिनत वादे रहेंगें साथ जीवन भर
मगर अब ढूंढता तुझको हूँ मैं इन चाँद तारों में
मुझे मालूम मिलना अब दोबारा है नहीं मुमकिन
मगर फिर भी तेरी ख्वाहिश में डूबे हम दीवाने हैं ॥

तेरे संग-संग चले जिन राहों पर सब याद है मुझको
मगर डरता हूँ उन गलियों को फिर से आज़माने में
मेरा मकसद नहीं खुद को परेशान मैं करूँ लेकिन
बहुत मज़बूर हूँ इस आशिकी को आज़माने में
चढ़ी तेरी खुमारी है उतरती ये नहीं "आखिर"
तुझे ही प्यार करते हैं तेरे ही हम दीवाने हैं ॥

॥आखिर॥ 

Sunday, August 31, 2014

ये तेरी याद है

कभी हंसाती है हमें तो कभी रुला भी जाती है
ये तेरी याद है , वक़्त बेवक़्त आ ही जाती है ॥

कभी लड़ती है मुझसे बहुत छोटी सी बात पे
कभी होती है गुस्सा मेरे हालत पे
मेरे दिन बनाती है कभी
तो कभी बिगाड़ भी जाती है
ये तेरी याद है , वक़्त बेवक़्त आ ही जाती है ॥

ये देखती नहीं है सुबह और शाम को
मेरी थकावट और मेरे आराम को
चुपचाप धीरे से मेरी दुनियां में आकर
ये अपना काम कर ही जाती है
ये तेरी याद है , वक़्त बेवक़्त आ ही जाती है ॥

ना जाने कितनी बार टोका है मैंने खुद को
ना जाने कितनी बार रोका है मैंने इसको
की ना आया कर यूँ मेरे ख्वाबों-खयालो में
पर हर बार ये मुझे दरकिनार कर ही जाती है
ये तेरी याद है , वक़्त बेवक़्त आ ही जाती है ॥

॥आखिर॥

Wednesday, August 27, 2014

आज मौसम ने करवट ली है कुछ

आज मौसम ने करवट ली है कुछ
हवाएँ भी भीगी-भागी सी लग रही है
एक टीस फिर से उठी है दिल में मेरे
तेरी आरज़ू फिर जागी-जागी सी लग रही है ॥

अब हर नज़ारे में मुझे तू ही दिखता है
मेरी सूरत भी अब तेरी परछाई सी लग रही है
तेरे नैन-नक्स के तो कई अफ़साने थे मगर
तेरी बातें भी अब रुबाई सी लग रही हैं ॥

आज आसमां भी तेरे रंग सा गुलाबी है
ये हवाएँ भी किसी शराबी सी लग रहीं हैं
इन घटाओं ने लिया है तेरी गेसुओं का रंग
ये बूँदें भी अब कुछ नवाबी सी लग रही हैं ॥

तेरे चेहरे का नूर लाजवाब है मगर
तेरी बिंदिया भी आज आफ्ताबी सी लग रही है
तेरी आखों का सुरमा , तेरे होठों की लाली
तू तारों से सजी शाहज़ादी सी लग रही है ॥

यूँ बन-संवर के आई है तू मेरी दुनिया में
तू मेरे ख़्वाबों की सच्चाई सी लग रही है
और मेरी कैफियत का अंदाज़ा नहीं है तुझे "आखिर"
किस कदर मेरी साँसें आज इन्कलाबी सी लग रहीं हैं ॥

॥आखिर॥

Saturday, August 23, 2014

तुझे ही ढूंढता हूँ और तेरी ही बात करता हूँ
न जाने क्यों यही हरकत मैं अब दिन-रात करता हूँ
नहीं आता सुकून दिन में नहीं अब चैन रातों को
की ख्वाबों में तुझे मिलने की ख्वाहिश यार करता हूँ ॥ 

Friday, August 15, 2014

!!मेरी आकांक्षा!!

ऐ-खुदा! मेरे जीवन में फकत ये आदत लिखना
जिऊं मैं वतन के लिए और मौत में शहादत लिखना ॥

ना मिले मुझे दो गज ज़मीन तो कोई गम नहीं
बस कफ़न में एक तिरंगा की चाहत लिखना ॥

मैं हिन्दू बनु या मुस्लमान ,या सिख या ईसाई कोई फर्क नहीं
बस फितरत में मेरी , मेरे वतन की इबादत लिखना ॥

ना रहे मेरा मुल्क किसी की गुलामी में
मेरे हमवतन की किस्मत में सिर्फ बादशाहत लिखना ॥

भूखा-नंगा ना रहे कोई वतन में मेरे
सब के नसीब में इतनी तो राहत लिखना ॥

मंदिरों और मस्जिदों ने सिर्फ बांटा है हमे अबतक
अबके बार उनमे भी जोड़ने की आदत लिखना ॥

जी सके सब लड़कियां सम्मान की एक ज़िन्दगी
मेरी साँस के हर कतरे पर उनकी हिफाज़त लिखना ॥

इतना करम "आखिर" में मुझ पर और करना ऐ-खुदा!
मेरे हर जनम में देश का एक नाम बस "भारत" लिखना ॥

॥आखिर॥

Monday, August 11, 2014

ज़रूरत है तेरी , तेरा तसव्वुर यार रहता है
ज़मी से उस फलक तक अब तू ही बस यार दिखता है
तू है महताब जीवन का मेरे अब जान ले ये तू
तू जितनी दूर हो उतना ही तुमसे प्यार रहता है ॥

॥आखिर॥ 

Saturday, August 9, 2014

कहीं खुद से शिकायत है कहीं तेरी इनायत है
तेरी दी ज़िन्दगी हर एक कदम पर जीने लायक है ॥

कभी ये खुशनुमा होती है तो हमको हंसती है
कभी ये रूठ जाती है तो संग हमको रुलाती है
हैं गर खुशियां भरी इसमें तो गम भी सहने लायक हैं
खुदा ये ज़िन्दगी हर एक कदम पर जीने लायक है ॥

Tuesday, August 5, 2014

तेरी पलकों के किनारे से
एक हाँ का इंतज़ार मैं आज भी करता हूँ
तेरी बाँहों के दरमियान जो बीते कभी
उस शाम का इंतज़ार आज भी करता हूँ
तू मेरे इश्क़ की इब्तिदा है
इबारत भी तू ही है "आखिर"
इबादत तेरी ही की है कि
तुझसे प्यार मैं आज भी करता हूँ ॥

॥आखिर॥

Friday, August 1, 2014

#अकेला_छोड़_आया_हूँ

बचपन के वो दिन जब हम ख़ुशी से झूमा करते थे
किसी काँधे पे चढ़ कर रोज़ मीलों घूमा करते थे
थी कुछ उँगलियाँ जिसने हमे चलना सिखाया था
गिरे जब भी सफर में हम तो एक आँचल का साया था
ना जाने क्यों ली करवट वक़्त ने यूँ दूर हम हुए
वो बातें अब फकत यादों सी हमको आ रुलाती है
मैं शर्मिंदा सा हो जाता हूँ उनका हाल-ए-दिल सुनकर
समय की दौड़ में जिनको अकेला छोड़ आया हूँ ॥

॥आखिर॥

Sunday, July 27, 2014

ऐ-खुद क्या वक़्त तूने अब दिखाया है
मेरी चौखट पे मेरी मन्नतों को लेकर आया है ॥

वो एक ख्वाहिश मेरे दिल की जो बरसों से अधूरी थी
सताकर मुझको इतना अब मुझे उस से मिलाया है ॥

मेरी आँखों में आंसू है तो ये दिल खुश भी है बड़ा
के रागों का अजब संगम मेरे मन पे यूँ छाया है ॥

और बद्नसीबियों के दौर से शिकवा नहीं है अब
कि खुशनसीबी ने मुझे अपने बनाया है ॥

कैसे करेगा शुक्रिया "आखिर" , मेरे मुर्शिद
दुआ मेरी कुबूली है , ये सर सिजदे झुकाया है ॥

है ये सुरुआत बस इसको समझना अंत न हमदम
अभी तो वक़्त है, मेरा भी सूरज जगमगाएगा ॥

॥आखिर॥ 

Thursday, July 24, 2014

जितने अपने थे सब बेगाने हो गए
तेरे जाते ही महफ़िल वीराने हो गए ॥

जो कल तक थी बस तेरे मेरे दरम्यान
वो सारी बातें अब अफसाने हो गए ॥

अब तक तुझमे ही देखि थी अपनी सूरत
आदत यूँ पड़ी कि आईने बेमाने हो गए ॥

तेरी बाँहों की गर्मी में जो पिघलता था मेरी रात का चाँद
आज वो तेरी यादों के सिरहाने हो गए ॥

और तू गया दूर यूँ कर कि सुधुरुंगा मैं "आखिर"
पर अब तो हम तेरे और भी दीवाने हो गए ॥


||आखिर||


Wednesday, July 23, 2014

ऐ खुदा वक़्त कुछ वो भी मेरे दर आये
मैं भी खुश हो सकूँ ऐसा कोई मंज़र आये ॥

जो मेरा यार है मुफ़लिस नसीबदारों में
एक ख़ुशी का ज़र्रा तो उसे नसीब आये ॥

तू जियादत्ति और न कर उसकी मेहनत पर ऐ-खुदा !
एक कामयाबी उसे भी तो मुक़र्रर आये ॥

और जाने ये ज़माना भी मेहनत के नतीज़ों को
कि उसके हौसलों में भी तो "आखिर" उड़ान आये ॥

॥आखिर॥

Monday, July 21, 2014

जीवन के सफर में अब तलक कई मोड़ आये है
मिला है कुछ हमे और हम बहुत कुछ छोड़ आये हैं
वो एक आदत जिसे जीवन में हमसाथी बनाया है
वो एक आदत हसीं जिसने हमे इंसान बनाया है
की जिसके दम पे औरों के ग़मों को दिल लगाया है
की बांटी है ख़ुशी भी हमने इसको आज़माने से
वो लिखने का जूनून 'आखिर' में अपने साथ लाये हैं ॥ 

Saturday, July 12, 2014

अरे जीवन की ख़ामोशी अनेकों राज़ कहती है
कभी अंजाम कहती है कभी आगाज़ कहती है ॥

अजब हैं लोग इसमें और अजब दस्तूर इसका है
सुनो तुम गौर से ये सब हकीकत आज कहती है ॥

सितारों की बुलंदी पर पहुंचना यूँ नहीं मुमकिन
बड़ा संघर्ष है पथ में ये तुमको आज कहती है ॥

हुई जीवन की है शुरुआत तो किलकारियों से पर
तुझे मारना है ख़ामोशी से 'आखिर' यार कहती है ॥

Tuesday, July 8, 2014

तू थी खुशबु के जैसी हवा में घुली
मैं तो भंवरे सा दर-दर भटकता रहा
चाहतो में तेरी डूबा कुछ इस कदर
तू थी मृगतृष्णा ये मैं समझ न सका
ढूंढते-ढूंढते वक़्त बहता गया
तेरी हसरत भी हर लम्हा बढ़ती गयी
अब उम्र जो ढली तो पता ये चला
मैं तेरे बिन न एक डग कभी था चला ॥ 

Monday, July 7, 2014

तेरी नज़रों से नज़रें मिलाना अच्छा लगता है
तेरा धीरे से यूँ मुस्कुराना अच्छा लगता है
यूँ तो बहुत है अफ़साने मोहब्बत के इस दुनिया में 'आखिर'
मगर पलकें झुका कर हाय!, तेरा शर्माना अच्छा लगता है ॥
||आखिर ||

Thursday, July 3, 2014

मुझे कुछ याद नहीं या 
बातों में तेरी खो गया हूँ 
नींद आती नहीं थी मुझको पर 
आज तेरी बाहों में सो गया हूँ 
है तेरे इश्क का खुमार या नशा शराब का
कि मैं क्या था और अब क्या हो गया हूँ ||

Wednesday, July 2, 2014

तेरे मेरे चाहने से क्या होगा 'आखिर'
मिलता वही है जो नसीब में रहता है
और वो भी देखेगा कभी मुफलिसी का आलम
जो आज हमे गरीब कहता है ॥ 

Thursday, June 26, 2014

मैं आखें बंद करता हूँ , तेरा दीदार होता है
खुली आखों में भी ,तेरा तस्सवुर यार होता है
हुआ ये क्या मुझे, मिलता सुकून ना तेरे बिन "आखिर"
कोई ये दे बता क्या इस तरह ही प्यार होता है ॥

Tuesday, June 17, 2014

एक नारी की अरदास !!

ईश्वर करम करना मौला रहम करना
जीवन में मुझको और नहीं अपमान पड़े सहना
ईश्वर करम करना मौला रहम करना ॥

ना आदमी ताड़े हमे हर एक मोड़ पर
ना आदमी छेड़े हमे अब शाम और शहल
हो तेरी झोली में पड़ी इंसानियत अगर
तू बाँट दे इनमे बराबर वो ज़रा-ज़रा
कि ना करें हुड़दंग ये इनपर नज़र रखना
ईश्वर करम करना मौला रहम करना ॥

मूकदर्शक ना मिले मुझको शहर में अब
चुप रहें ना कुछ कहें जो देख-सुन के सब
कुछ इनायत कर ज़रा इनको तू हिम्मत दे
कि साथ दें लड़ने में ज़ुल्मी से ज़रा ये सब
गांधी के बन्दर ना बने बस ये करम करना
ईश्वर करम करना मौला रहम करना ॥

मैं सर उठा के जी सकूँ मुझको ये बल मिले
मैं जब ख़ुशी से हंस सकूँ मुझको वो पल मिले
चाहे बड़ी घनघोर सी काली सी रात हो
जिस पल तुझे सोचूं मुझे उस पल में तू मिले
तू कृष्ण बनकर द्रौपदी की फिर शरम रखना
ईश्वर करम करना मौला रहम करना ॥

॥आखिर॥ 

Thursday, May 8, 2014

खामोश क्यों खड़ा है दिल , कुछ खुराफात कर
यूँ बैठने से होगा क्या , तु दिन को रात कर
आया है नज़र मुद्दतों मे ,  ईद का वो चांद
घुल जाए बाहों मे तेरी , कुछ तो फिराक़ कर ॥

बस देखता रहेगा क्या , कुछ बोल तो जरा
आँखों से बात कि बहुत  , लब खोल तो जरा
वो भी बनेगा हमसफ़र , हर रात का तेरे
तू राज़ अपने दिल का , कभी खोल तो जरा ॥

॥आखिर॥

Sunday, April 27, 2014

तू जीवन के तरन्नुम पर ख़ुशी के गीत गए जा
मुसीबत कैसी भी हो पर ज़रा तो मुस्कुराये जा
मज़ा आएगा जीने का भरी दुनिया में तब 'आखिर'
कि जब तू खुद दुखी होकर के औरों को हंसाएगा ॥

॥आखिर॥ 

Monday, April 21, 2014

देखने को नए मंज़र मिले

हम अपने घर से निकल एक शहर गए
तो बदले हुए हमे हर मंज़र मिले
एक संगम छोड़ा था हमने घर पर
वहाँ पहुचे तो समंदर मिले
देखने को नए मंज़र मिले ॥

ज़िन्दगी तो वही थी पर रफ़्तार तेज़ थी
आदमी की आदमी पर मार तेज़ थी
कुछ झाँका करती थी लोकल से लटक कर
तो कुछ के हाथों में कार तेज़ थी ,
मेरे घर में तो अब भी बग्गियां चलती हैं
पर वहां लोग गाड़ियों के अंदर मिले
देखने को नए मंज़र मिले ॥

घर थे कुछ अपने जैसे पर ऊँची उनकी काया थी
जिनमे रहना और नहीं कुछ बस पैसों की माया थी
वहीँ बगल में पड़ी सड़क पर कई ज़िन्दगी रोती थी
न सर पे थी छत उसके और न खाने को रोटी थी ,
मेरे घर में तो अब भी छत मिल जाती है गरीबों को
पर वहां वो मलिन बस्तियों के अंदर मिले
देखने को नए मंज़र मिले ॥

ना जाने क्या था पानी में , बच्चा "बच्चा" लगा नहीं
सारी हरकत परिपक्वा सी कोई कच्चा लगा नहीं
वो विद्यालय के कपड़ों में रोज़ घरों से निकलते थे
शाम किसी का हाथ वो पकडे चौपाटी पर मिलते थे ,
मेरे घर में तो अब भी कुछ लडकपन है बच्चो में
पर वहां वो प्रेम के अंदर मिले
देखने को नए मंज़र मिले ॥  

Monday, March 17, 2014

मेरी होली ज़रा सी संवर जायेगी

एक अँधेरे में थी ये मेरी ज़िन्दगी
तुम अगर आओ तो रोशनी आएगी
पूरी की पूरी थी ये तो बिखरी हुई
तेरे आने से थोड़ी संवर जायेगी
जाने कितने ही सावन अकेले गए
भूल कर भी न रंगों को मैं छु सका
अबके फाल्गुन अगर तुम इधर आओगे
मेरी होली ज़रा सी संवर जायेगी ॥

मैं तो बंज़र ज़मीं सा था सूखा हुआ
तेरे आने से इसमें नमी आएगी
ठूंठ कि तरह मैं कब से तनहा खड़ा
तेरे आने से कुछ कोपलें आएँगी
बारिशों ने मुझे जाने कब था छुआ
सूखे रंगों सा मैं तनहा उड़ता रहा
गर घटा बनके अब तू बरस जायेगी
मेरी होली ज़रा सी संवर जायेगी ॥

आज कल रात में नींद आती नहीं
तेरे आने से सपने भी आ जायेंगे
चाँद भी बादलों में था छुपता रहा
तेरे आने से फिर चांदनी आएगी
दिल परेशां था मैं भी हैरान था
तुमको देखा तो इसमें उमंगें उठीं
सोचता हूँ अगर मुझको चाहोगे तुम
प्यास मेरी मोहब्बत कि बुझ जायेगी
गर कभी भूल कर तुम इधर आओगे
मेरी होली ज़रा सी संवर जायेगी ॥

                         ॥आखिर॥

Friday, March 14, 2014

जब से मिले हो तुम , सब बदल गया है जैसे 
कि अब जग झूठ और तेरा प्यार सच्चा लगता है 
और यूँ तो बहुत बड़बोले थे हम मगर 
अब चुप-चाप तेरे करीब रहना अच्छा लगता है ॥

और लाल पीले हरे नीले , कई रंग देखे थे हमने
पर तेरे रंग के आगे ये सब कच्चा लगता है
कि अब तक खेलते थे हम , इन रंगों में डूब कर होली
पर अब तेरे प्यार के रंग में रंगना अच्छा लगता है ॥

"आखिर"

Friday, March 7, 2014

है चुनाव एक बार हमे फिर अपना फ़र्ज़ निभाना है
भारत का वासी होने का एक कर्त्तव्य निभाना है
कि न पहुचे कोई चोर उचक्का संसद  के गलियारों में में
सोच समझकर प्रत्याशी को वोट डालने जाना है ॥ 

Thursday, February 13, 2014

जब पहली बार मिले थे हम

तन्हाई का आलम था जब पहली बार मिले थे हम
रिम-झिम गिरता सावन था जब पहली बार मिले थे हम
बारिश कि बूंदों ने हम दोनों को खूब भिगाया था
यूँ भीगे-भागे , सहमे से पहली बार मिले थे हम ॥

दिल में थे जज़्बात मगर हर लम्हे में खामोशी थी
तुम भी चुप थी मैं भी चुप था जाने का मदहोशी थी
मैं तुमको जब एक टक देखूं तो तुम शरमा जाती थी
ऐसे में जब बदल गरजे तो तुम घबरा जाती थी
कैसा वो आलम था जब एक दूजे में खोये थे हम
और भूला था मैं जग को जब पहली बार मिले थे हम ॥

तुम गुलाब की पंखुड़ी जैसी मैं भवरे सा था मूरख
बाकि सब मैं भूल गया जब से देखी तेरी सूरत
पानी कि बूँदें थीं तुम पर मोती जैसी चमक रहीं
कनक कलेवर में भीगी सी खजुराहो कि तुम मूरत
काले बदल के घिरने पर , बिजली जैसी थी चमकी तुम
चकाचौंध ये आँखें थी , जब पहली बार मिले थे हम ॥

फिर तुम जाने लगी , अचानक मुझको ये एहसास हुआ
कल तक मेरा दिल था , मेरा अब वो तेरे पास हुआ
दूर गयी जब तुम तो मेरे दिल एक कसक उठी
फिर लौटी तुम , लगी गले , तो जीवन का एहसास हुआ
पुरबइया और पछिया जैसे उस सावन में साथ मिले
हुई  मोहब्बत मुझको भी यूँ अब हम पहली बार मिले ॥ 

Monday, February 3, 2014

तन्हाई में चुप चाप रहना अच्छा लगता है 
ख़ामोशी से एक दर्द सहना अच्छा लगता है 
वो जिनकी याद हमे हर कहीं तनहा कर जाती है 
सामने उसके कुछ न कहना अच्छा लगता है ।

मिलकर उससे बिछड़ न जाएँ कहीं , डरते है
इसीलिए बस दूर ही रहना अच्छा लगता है
जी चाहे हर खुशियाँ लाकर देदूं उसे
उसके प्यार में सब कुछ करना अच्छा लगता है
उसका मिलना न मिलना . किस्मत की बात है
पर हर पल उसकी याद में रहना अच्छा लगता है ।।

Saturday, January 25, 2014

हे भारत के आम मनुज !

ना जाओ उस ओर  जिधर
एक भीड़ चली जाती सी दिखे
ना जाओ उस छोर जिधर
एक राह सरल सीधी सी दिखे
पथिक चलो उस ओर जिधर
हो कांटे तेरे पथ में बिछे
लहू-लुहान हो मार्ग तेरा
बस कुछ ही लोग खड़े हो दिखे
सच्चाई का पथ है उसपर
ले सबका आशीष चलो
हे भारत के आम मनुज !
सब मिलकर सच कि राह चलो॥

दम्भ भरो न तुम
अपनी जाती का न अभिमान करो
करम धर्म के नाम पे ना
एक दूजे का अपमान करो
सम्प्रदाय कि आग
ना जाने कितने घर को निगल गयी
न हो कोई अब अनाथ
कुछ इनका समाधान कारो
भाईचारा बढे देश में
ये प्रण लेकर आज चलो
हे भारत के आम मनुज !
सब मिल कर प्रेम कि राह चलो ॥

होड़ लगी है न जाने क्यूँ
पैसा खूब कमाने की
जिस पथ से हो जैसे भी हो
अपना काम बनाने कीं
इस चक्कर में हम सब भैया
भ्रष्ट राह पर चले गए
अब कोशिश करनी है इनको
फिर सुमार्ग पर लाने कि
स्वाभिमान से करें काम हम
ये संकल्प ले आज चलो
हे भारत के आम मनुज !
सब मिल ईमान कि राह चलो ॥

हमने जिनको सदियों पूजा
वो शक्ति है नारी है
आज वही नारी है शोषित
पीड़ित है बेचारी है
ना जाने क्या हुआ हमे कि
हर नर अब व्यभिचारी है
ऐसा लगता है अपनी
सभ्यता पतन कि बारी है
दूर करें इन विकृतियों को
ये कोशिश कर आज चलो
हे भारत के आम मनुज !
तुम सदाचार कि राह चलो ॥

आज हमारे देश में
टोपी कि एक लहर सी छाई है
जिसको देखो टोपी पहने कहता
ये दल भाई है
ये है सच्चा सही वही
ये नारी का रखवाला है
इसके आगे चलने से
ये देश बदलने वाला है
आखिर कहता मत बांधो तुम
खुद को "टोपी-जालों" में
नाम करो न तुम अपना
एक दल को चाहने वालों में
लेकिन तुम ये करो प्रतिज्ञा
अपना फ़र्ज़ निभाओगे
हर एक अत्याचारी को तुम
अब चुनाव हरवाओगे
कि न पंहुचे कोई चोर उचक्का
संसद में ले ये काम चलो
हे भारत के आम मनुज !
सब मिलकर देश कि राह चलो ॥


||शशांक कुमार पाण्डेय 'आखिर'||

Monday, January 20, 2014

जीवन एक दरिया है इसको तैर पार कर जाने को
इस मजलिस में खुद का अपना एक आशियाँ बनाने को
हर महफ़िल में अपनी एक पहचान अलग सी बनाने को
पैर ज़मीं रखो अपने पर ख्वाब फलक तक जाने दो ॥ 

Tuesday, January 7, 2014

प्यार इसी को कहते है शायद !

प्यार इसी को कहते है शायद !
जिसमे कुछ बोले बिना हर बात होती है
मैं इशारे में इज़हार करता हूँ
वो इशारे में इकरार करती है

प्यार इसी को कहते है शायद !
जिसमे न जाने कब दिन कब रात होती है
वक़्त का पता ही कहाँ चलता है
ख़्वाबों में भी तो उनसे बात होती है

प्यार इसी को कहते है शायद!
जिसमे कुछ पाना नहीं बस खोना अच्छा लगता है 
उसके अक्स को आँखों में संजोना अच्छा लगता है 
महफ़िलों का शोर सुनाई देता कहाँ हमे
इसमें तो तन्हाई में रोना अच्छा लगता है । 

प्यार इसी को कहते हैं "आखिर"
जिसमे अपना सब कुछ उसके नाम होता है 
अरे बस यार का नाम रहता है ज़ुबान पर 
आशिक तो गुमनाम होता है । 

प्यार इसी को कहते हैं शायद!