Friday, September 6, 2013

भूल गए है लोग

ज़िन्दगी को अपनी भूल गए है लोग
बंदगी को अपनी भूल गए है लोग
जो खेलते थे कभी गाँव की इन गलियों में
आज शहरों में जाकर डूब गए है लोग
भूल गए है लोग ॥

सदियों पुराणी संस्कृति को
वो दुर्गा और उस पारवती को
जिसको हम सदियों से पूजते थे
आज उनसे क्यूँ दूर गए है लोग ?
कुछ तो है जिसे
भूल गए है लोग ॥

जिनके आने से घर में खुशियां आती थी
जो इस दुनियां की जननी कहलाती थी
पर आज न जाने क्यूँ
उन्हें ही आने से रोक रहे है लोग ?
लगता है उनका महत्त्व
भूल गए है लोग ॥

आज जहाँ देखो वहां एक दुखियारी है
क्यूँ ज़िन्दगी की हर दौड़ में पिसती सिर्फ नारी है ?
हर मोड़ हर चौराहे खड़े बस हवस के पुजारी है
जिससे होकर गुजरना हर नारी की लाचारी है
क्यूँ उत्तेजना में इतने निर्लज्ज हुए है लोग ?
लज्जा आती नहीं इन्हें या क्या होती है ?
भूल गए है लोग ॥

क्या हो गया है लोगों को
ये कैसी विकृत छाई है
पहले औरत , फिर लड़कियां और
अब तो बच्ची भी नहीं बच पाई है
और विडम्बना यही है की
मानव जन्म लेकर भी , जानवरों की तरह हो गए है लोग
लगता है जैसे अपनी मानवता
भूल गए है लोग ॥

ये मेरा देश अपनी सभ्यता के लिए
पूरी दुनिया में विख्यात था
उत्तर दक्षिण पूरब पश्चिम
बस इसका ही राग था
शांति और सदभाव के प्रतीक
इस देश में , हर व्यक्ति आना चाहता था
पर कुछ दिन से देश में काफी गहमा गहमी है
आये दिन अत्याचार के किस्सों से मानवता भी सहमी है
और आलम ये है की दूसरों में तो दूर
आज अपनों में भी अपनों का खौफ है
लगता है जैसे शांति से ख़ुशी से रहना
भूल गए है लोग ॥

तो ऐसा क्या हुआ आज की
लोग हमसे ही डरने लगे हैं ?
हम क्यूँ हर बात पर हर दिन
अपनी ही इज्ज़त को तार-तार करने लगे है ?
नारी की ऐसी दुर्गति इस देश को
ऐसे अन्धकार में ले जाएगी
फिर जहाँ हमे देखने
सूरज की एक किरण तक नहीं आएगी
ये सब जानते हुए भी
फिर उसी राह पर चल दिए है लोग
ऐसा लगता है , अपनी विरासत , अपनी सभ्यता
अपना देश
भूल गए है लोग ॥

                                               शशांक कुमार पाण्डेय 'आखिर'