Thursday, August 15, 2013

आओ मिल कर याद करें वीरों की अमर कहानी को

भारत देश महान मेरा हर कोई दिल से गाता है
पर आज़ादी का मतलब कोई भी समझ ना पाता है
जिसके पीछे माँ ने अपने बेटों को कुर्बान किया
न जाने कितनी अबलाओं ने सुहाग का दान किया
बुझ जाये घर का चिराग झंडे की लाज बचाने को
काम आये उसका भी खून इस धरती को उपजाने को
इस आज़ादी को पाने में दी गई हर क़ुरबानी को
आओ मिल कर याद करें उन अगणित अमर कहानी को ॥

जब अंग्रेजों ने भारत में आकर धंधा खोल था
मुग़ल प्रशाशन की नीवों को उसने जमकर तोला था
घात लगा कर था बैठा मौका मिलते ही वार किया
मुग़लों से छीना गद्दी , तब से भारत पर राज़ किया
करता था शोषण हर दिन , खेतों की हरी जवानी का
धर्मभ्रस्ट करने को आतुर था , हर हिंदुस्तानी का
तब जाग ब्राह्मण एक जिसने दुष्टों का संघार किया
परशुराम सा शंखनाद कर जनशक्ति का प्रचार किया
जिसने दी सुरुआत हमे आज़ादी के पथ जाने को
आओ मिल कर याद करें "मंगल" की अमर कहानी को ॥

परुष नहीं केवल थे इसमें महिलाओं की भी टोली थी
जिसने हंस के अंग्रेजों संग खेली खून की होली थी
घर छोड़ा चूल्हा छोड़ा धरती की आन बचने को
बच्चे को कंधे पे ले वो लड़ गयी तीर कमानों से
ऐसी लड़ी मजबूर हुए वो लोहे के चने चबाने को
आओ मिल कर याद करें "लक्ष्मी" की अमर कहानी को ॥

फिर आया वो दौर की जिसमे "शेखर" ने रण खोला था
पंद्रह कोड़े खा कर भी भारत माँ की जय बोला था
एक लड़का था साथ "भगत" जिसकी आँखों में शोला था
खून का जिसके हर क़तरा बस आज़ादी ही बोल था
एक उनमे थे "हसरत" जिसने इंक़लाब का ज्ञान दिया
वन्दे मातरम कह कर "बंकिम" ने हमको अभीमान दिया
इंक़लाब के शोलों से भर एक मशाल जलने को
आओ मिल कर याद करें वीरों की अमर कहानी को ॥

फिर आई लाठी जिसने अंग्रेजों का अप्मान किया
बिना लडे ही जिसने अपनी ताकत का संज्ञान दिया
फिर सुभाष ने खून मांग आज़ादी का विश्वास दिया
भारत छोडो कहकर हमने अंग्रेजो को फांस दिया
हार मान फिर अंग्रेजों ने अपने घर को प्रस्थान किया
कैसी सुखद घडी थी जब अपने झंडे को मान मिला
देशवासियों को उस दिन आज़ादी का सम्मान मिला
तब निकले "चाचा" हमको प्रगति की रह दिखने को
आओ मिल कर याद करें वीरों की अमर कहानी को ॥

सडसठ वर्ष हुए है हम अब भी वो जश्न मानते है
आज भी हम हर पल उस आज़ादी के गीत को जाते है
जिन शब्दों ने भारत को दुनिया में एक पहचान दिया
जन गन मन कहकर "रविन्द्र" ने भारत को वह नाम दिया
जीना मरना मेरा माँ बस इन तेरे चरणों में हो
नतमस्तक हो शीश मेरा जब भी तेरा ये वंदन हो
चाहे जितनी जो खुशियाँ पर वीरों का अपमान न हो
मोल नहीं उस आज़ादी का जिसमे उनका नाम न हो
करता है 'आखिर' ये नमन आज़ादी के परवानो को
आओ मिल कर याद करें हम अपने अमर जवानों को ॥

                                                              || शशांक कुमार पाण्डेय 'आखिर' ||