Saturday, October 1, 2011

मैं क्या था और क्या बन गया
बेजान ज़मीं था मैं आफ़ताब बन गया
तेरे इश्क में कुछ ऐसा फ़िदा हुआ हु मैं कि
तुमसे वफाई की और खुद से बेवफा हुआ ||

अनजान डगर थी इस रहें गुलिस्तान की
चलता रहा मैं जिसपे अंधों की तरह यूँ
फिर जाने क्या गजब सा असर मुझपे हुआ यूँ
रहें की जैसे रुक सी गयी मैं भी थम गया ||

कैसा अजब सा दर्द ये मुझको दिया खुदा
पाकर मैं अपने प्यार को क्यूँ मैं न पा सका
हर पल मैं सोचता हु यहाँ क्या खता हुई
क्यूँ जीते जी मैं तेरे इश्क में फ़ना हो गया ||