Thursday, December 2, 2010

इश्क

चाहतों की महफ़िलों का
अब किनारा न रहा
दोस्तों की दोस्ती का
अब सहारा न रहा
मंजिलों और महफ़िलों की
आस थी दिल में मगर
तेरे इश्क में ज़ालिम
ये दिल हमारा न रहा||


उम्मीद का दामन हमेशा
हमने था रखा
तुझसे दूर रह के भी
तुझे पाने की थी इच्छा
तेरे इश्क का जूनून
ही कहूँगा मैं इसे
मझधार में था मैं पर
साहिल पे जा उतरा ||


आशिक थे हुस्न के
ज़ालिम कभी हम भी
इस बाग़ की आबो हवा के
शक्स थे हम भी
अब प्यार से रिश्ता
न रहा है ज़रा हमे
वरना तेरी अदा के
कदरदान थे हम भी||