Thursday, October 21, 2010

JANMDIN....:)...:(

जन्मदिन


सोंचता था हूँ ज़रा शरीफ
नहीं होगी इतनी तकलीफ
पर ये भ्रम मेरा तोडा
सब ने मुझे ऐसा फोड़ा
फितरत थी उनकी कुछ अजीब
बचा न पाया मैं अपनी तशरीफ़
अब न उठता हु न बैठता हूँ
ऐसे ही घूमता हूँ
हर पल एक दर्द महसूस करता हूँ
जब उस रात को याद करता हूँ
जब मनाया था मैंने
अपने जन्मदिन का त्यौहार
हॉस्टल में पहली बार |
जब धोया था लोगों ने मुझे समझ के बेकार
याद आते ही हो जाता हु मैं बेक़रार
भगवान् न करे
दुबारा आये ये जन्मदिन का त्यौहार
न सोमवार न शुक्रवार न रविवार
क्यूंकि जब बी आएगा
तो कराएगा मुझे एक दर्द का एहसास
जिससे झूझते हुए
न जाने कैसे बीती थी वो सुहानी रात |||

6 comments:

  1. zabardast..
    poori dastaan bayan kar diya!!
    :D :D :D

    by the way,

    Happy Birthday bhai!
    Many Many Happy Returns of the Day! :) :) :)

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  2. thanku gaurav.....:)....
    jaab aap itna marr khao to koi option nahi bachta hai ....:(

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  3. mast hai dost..
    kavita kab se likhne lage..

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  4. are lakshan to pahle se hi the.....but AB UBHAR K AA RAHE HAI...:P

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